आपको मराठी आती है ?

भारत का संविधान कहता है कि देश का कोई भी नागरिक देश के किसी भी भाग में जा कर रह सकता है, वही बस सकता है और अपने जीवनयापन के लिए वही कोई रोज़गार भी कर सकता है। लेकिन महाराष्ट्र में ये संविधान लागू नही होता।
महाराष्ट्र सरकार ने अपने फैसले के कहा है कि वह टैक्सी चलने का परमिट उन्ही को दिया जायेगा जो वह पिछले १५ सालों से रह रहा हो, उसे मराठी लिखना, बोलना और पढना आता हो। भारत के नक़्शे में आने वाले बम्बई नही नही, मुंबई के हमारे संविधान के विपरीत क़ानून लागू होते हैं। कोई उनकी बाहें नही मरोड़ता है। स्थानीय लोगों को रोज़गार दिलाने के लिए भारत के किसी भी राज्य में ये तरीका नही है। आप पंजाब में जाकर बिना पंजाबी के, बंगाल के बिना बंगाली के, गुजरात के बिना गुजरती के कोई भी काम कर सकते हैं। हालाँकि एक इंसान अगर कई सालों तक एक जगह रहता है तो वह की सारी चीज़ें भी सीख ही लेता है। तो भैया इसके लिए कोई कानून बनाने की क्या ज़रूरत है ?
राज भैया की चले तो वो मराठियों के विकास के लिए मुंबई को भारत से ही अलग कर दें। क्योकि अगर वो भारत के रहा तो वह भारत का संविधान लागू होगा। ये वो संविधान है जिसके एक एक शब्द का महत्व है। जो जम्मू कश्मीर से कन्याकुमारी और अरुणाचलप्रदेश से गुजरात तक लागू होता है।
विदेशों में ये ज़रूर नियम है कि वहां का वीजा तभी दिया जायेगा जब वह जाने वाले व्यक्ति को वह की भाषा आती हो। लेकिन अब तो अपने देश में भी स्थानीय भाषा के बिना कोई काम नही कर सकता....

बढ़ रही है चीनी में कड़वाहट

चीनी की कड़वाहट ने कृषि मंत्री की जबान को भी कड़वी का दिया है...तभी तो कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि मै कोई ज्योतिषी नहीं हूं, जो ये बता सकूं कि महंगाई कब रूकेगी। महंगाई रोकने के असफल रही सरकार ने चीनी की बढती कीमतों का कसुर यूपी सरकार पर थोप दिया है। चीनी के बढती कीमतों से आम आदमी परेशान हो गया हो लेकिन सरकार को इससे कोई मतलब नहीं रह गया है।
ये आलम है हमारे कृषि मंत्री का....की उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है की चीनी की कीमत कब कम होगी? सरकार के कथित तमाम प्रयासों के बावजूद महंगाई बेतहाश बढ रही है, जिससे आम आदमी बेहाल है। महंगाई का आलम यह है कि चीनी के दाम 20-25 रूपए प्रति किलो बढकर 45 रूपए प्रति किलो तक पहुंच गई है।

शरद पवार के अनुसार चीनी की कीमतों पर लगाम लगाने के लिए विदेश से 20 लाख टन रॉ चीनी महंगाई थी। लेकिन यूपी सरकार ने इसकी प्रोसोसिंग की इजाजत नहीं दी। उन्होंने कहा कि कांडला पोर्ट पर यह चीनी यूं ही पडी हुई है। गौरतलब है कि महंगाई के मोर्चे पर केन्द्र सरकार विफल साबित हुई है।
आम के साथ कांग्रेस का हाथ, के जुमले वाली सरकार चुप्पी साधे बैठी है....जनता परेशान है लेकिन कृषि मानती आश्वाशन दे रहे हैं की अगले ३ सालों तक चीनी की कीमत घटने वाली नहीं है....कृपया जो लोग मीठा खाने के शौक़ीन हैं वो अपनी ज़बान पर थोडा काबू रखे....

कुल आबादी का 37 प्रतिशत हिस्सा गरीब

भारत की कुल आबादी का 37 प्रतिशत हिस्सा ग़रीबी में जी रहा है।भारत सरकार की ओर से नियुक्त एक समिति की रिपोर्ट के अनुसार हर तीसरा भारतीय दरिद्रता में जीवन व्यतीत कर रहा है। जी हैं ये सच है। दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु जैसे शहरों में दिखने वाला गरीब झारखण्ड, उड़ीसा और बुंदेलखंड के गरीबों से अलग है प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष सुरेश तेंदुलकर के नेतृत्व वाले विशेषज्ञ समूह का कहना है कि देश में ग़रीबों की तादाद में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और इस तरह भारत की कुल आबादी का 37 प्रतिशत हिस्सा ग़रीब है।रिपोर्ट के अनुसार 41।8 प्रतिशत ग्रामीण आबादी प्रति माह केवल 447 रुपए से खाना, कपड़ा और ईंधन की ज़रूरतों को पूरा करती है। ग़रीबी के मामले में राज्य स्तर पर उड़ीसा और बिहार की स्थिति सबसे ख़राब है, वहीं नगालैंड, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर में सबसे कम ग़रीब रहते हैं। विशेषज्ञ समूह का कहना है कि शहरी इलाक़ों की हालत कुछ बेहतर है, वे लोग खाना, कपड़ा और ईंधन की ज़रूरतों के लिए 579 रुपए प्रति माह ख़र्च करते हैं. उड़ीसा की आधी आबादी ग़रीब है. दूसरी ओर चरमपंथ प्रभावित जम्मू और कश्मीर सबसे अमीर राज्य है जहाँ सरकारी आँकड़े के अनुसार पाँच प्रतिशत ही लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं। दूसरी ओर चरमपंथ प्रभावित जम्मू और कश्मीर सबसे अमीर राज्य है जहाँ सरकारी आँकड़े के अनुसार पाँच प्रतिशत ही लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं। इन आंकड़ो को पढने के बाद विकास की बात झूठी लगती है।

हम किसी से कम नहीं....

महिलाएं आज भले ही हर क्षेत्र में उंची तनख्वाह और उंचे ओहदे पर काम कर रही हैं। लेकिन अभी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां महिलाओं को ये कह कर मना किया जाता है कि उनके प्रजनन से संसाधन का अपव्यय होगा। जी हां हम आज बात कर रहे हैं, सुखोइ विमान उड़ाने पर वायु सेना के उपाध्यक्ष एयर पी. के. बारबोरा के बयान पर। उन्होंने कहा कि महिलाओं के परिवार बढ़ाने की क्षमता के कारण फाइटर पायलट के प्रि’ाक्षण पर किए जाने वाले समय और खचZ का अपव्यय होगा। आज राष्ट्रपति प्रतिभी देवी सिंह पाटिल ने भी सुखोई में उड़ान भर कर ये साबित करने की कोशिश की है की महिलाये किसी से कम नही हैं..
महिलाओं को बराबर का हक दिलाने की बात करने से कुछ नहीं होगा। महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी सेवा को जिम्मेदारी के साथ निभा रही हैं। वायुसेना में भी महिलाएं काम कर रही हैं लेकिन सिफZ प्रजनन के कारण अगर उसे फाइटर पायलट के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, अगर किसी लड़की में एक फाइटर पायलट बनने के सभी गुण मौजूद हैं तो उसे रूका नहीं जाना चाहिए।
माना कि एक फाइटर पायलट के प्रि’ाक्षण पर लगभग 11 करोड़ रुपये का खचZ आता है। ये आधार बिल्कुल ठीक नहीं है कि बच्चे को जन्म देने के लिए महिलाएं एक साल तक सुखोइZ नहीं उड़ा पाती जिससे समय का अपव्यय होता है। अगर ऐसा है तो महिलाओं को कोइZ काम नहीं करना चाहिए। अंतरिक्ष यात्री, पुलिस सेवा और सेना, ये कुछ ऐसी सेवाएं हैं जहां महिलाओं को काफी ‘ाारीरिक श्रम करना पड़ता है। लेकिन वे अपनी भूमिका का बेहतर तरीके से निभा रही हैं।
भारत में अभी तक सेना में महिलाओं की संख्या और दे’ाों की तुलना में काफी कम है।

महिलाएं हर क्षेत्र में सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं, लेकिन सेना जैसे क्षेत्र में उनकी उपस्थिति बहुत कम है। अभी तक सेना में महिलाओं को केवल प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया गया है। उन्हें युद्ध से अलग रखा गया है। हाल ही में सीमा सुरक्षा बल ने महिला बटालियन को भारत-पाकिस्तान की सीमा पर तैनात किया, तो इस बहस ने जोर पकड़ लिया कि क्या महिलाओं को युद्ध क्षेत्र जाने दिया जाना चाहिए?
महिलाओं की युद्ध क्षेत्र से दूरी को उचित बताने वाले लोगों का तर्क है कि प्रकृति के अनुसार महिलाएं युद्ध के लिए पूरी तरह सक्षम नहीं हैं। उनमें पुरुषों जैसी शारीरिक शक्ति का अभाव है। सबसे पहले महिलाओं को डॉक्टर के पदों पर 1943 और नर्सों के रूप में 1927 में शामिल किया गया। 1992 के बाद शोर्ट सर्विस कमीशन के माध्यम से उन्हें युद्ध से अलग अधिकारी पदों पर नियुक्ति दी गई । इसके बाद महिलाओं के लिए सेना के शिक्षा, कानून, सिगनल, इंजीनियरिंग, तकनीकी और खुफिया विभागों का दरवाजा खुला। भारतीय सेना में अभी 2.44 प्रतिशत, नेवी में 3 प्रतिशत और वायुसेना में 6.7 प्रतिशत महिलाएं कार्यरत हैं। वर्तमान में इंडियन नेवी में 258 महिला अधिकारी हैं। ओम्र्ड फ़ोर्स मेडिकल सर्विस में 752 महिला चिकित्सा अधिकारी हैं। जिसमें 86 महिला दंत चिकित्सा और 2,834 महिला नर्सिंग सेवा में कार्यरत हैं।
अगर विदेशों की बात की जाए तो वहां की सेनाओं में महिलाओं की संख्या काफी अधिक है। अमेरिका में लगभग 2 लाख महिलाएं अमेरिकी सेना में हैं, जो अमेरिकी सेना का 20 प्रतिशत के बराबर है। इनमें से कई महिलाएं इराक में तैनात हैं। इस्राइली सेना में भी महिलाओं की संख्या कम नहीं है। लेकिन उन्हें युद्ध क्षेत्र में नहीं भेजा जाता। बि्रटेन में महिलाओं को 1990 में शामिल किया गया। यहां की सेना की तीनों कमानों में लगभग 2 लाख महिलाएं कार्यरत हैं। कनाडा की सेना में महिलाओं की संख्या 13 प्रतिशत है। इसमें सेना के द्वारा लिए जाने वाले फैसलें में भी महिलाएं अपनी भूमिका निभाती हैं। रूस और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी महिलाओं को युद्ध भूमि से दूर रखा गया है। कई इस्लामिक देशों में भी महिलाओं का सेना में प्रवेश वर्जित किया गया है।

इसके पीछे कई कारण गिनाए जाते हैं। महिलाओं को सेना में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जिसमे मनोवैज्ञानिक और शारीरिक कारण प्रमुख हैं। हालांकि विषम परिस्थितियों में अपने परिवार से दूर रहने वाले पुरूश भी कई बार इन समस्याओं से दो-चार होते हैं लेकिन उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। हर बार औरतों को यह एहसास कराया जाता है कि वह स्त्री है इसीलिए वह कोई काम नहीं कर सकती। यही वजह है कि आज महिलाओ ने अपनी काबलियत और अपनी बुद्धमिता साबित कर दी है। जहां तक शारीरिक ताकत की बात है तो बंदूक से गोली चलाने के लिए शारीरिक ताकत से ज्यादा दिल और दिमाग से मजबूत होना ज्यादा जरूरी है। महिलाओं को युद्ध क्षेत्र से दूर रखने को कई लोग तर्क रूप बताते हैं, इनमें ज्यादातर वैसे लोग होते है, जो महिलाओं को आज भी घर की चारदीवारी में रखना चाहते हैं। महिलाओं की शादी को भी सेना की नौकरी के लिए एक रूकावट माना जाता है। लेकिन वैसे तो किसी भी नौकरी में शादी को रूकावट के रूप में ही देखा जाता है।
प्राचीन काल से ही सेना पर पुरुषों का प्रभाव रहा है। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने अपनी रियासत के लिए अंग्रेजों के खिलाफ तलवार उठा ली थी। हाल ही में भारतीय सेना में भी महिलाओं को सबसे संवेदनशील भारत-पाकिस्तान की सीमा पर तैनात किया गया है। इसे भारतीय सेना में एक अभूतपूर्व कदम माना जा रहा है। यह साबित करता है कि धीरे धीरे ही सही अब सेना में भी उनकी भागीदारी को अहम माना जा रहा है। अगर यह दौर इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं होगा जब भारतीय सेनाओं में महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगी।


हिट होने का पैमाना है अशलील गीत


हिन्दी गानों की बात की जाये तो सबसे अधिक लोग सदाबहार गीतों को ही पसंद करते हैं। कितने गाने आये और चले गये लेकिन सदाबहार गीतों का नशा आज भी पूरेशबाब पर है। संगीतप्रेमी आज भी मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर जैसे गायकों के गीत पूरे चाव के साथ सुनते हैं। लेकिन कुछ साल पहले आई कई फिल्मों में हिन्दी गानों को हिट बनाने के लिए उनमें कुछ ऐसेशब्द डाले गये जिसने उस गाने पर अशलीलता ठप्पा लगा दिया। सन् 1993 में आई फिल्मखलनायककाचोली के पीछे क्या है, चुनरी के नीचे क्या हैवाला गीत, जिसे गुनगुनाने में भी आजशर्म जाती है। उस वक्त सभी के जुबान पर छा गई थी। इसके बाद आई फिल्मदलालका गीतचढ़ गया उपर रे, अटरिया पे लोटन कबूतर रेकाफी शहूर हुआ, लेकिन इसकी वजह कुछ और थी। इस गीत में गीतकार ने दोहरे अर्थ वाले संवाद लिखे थे। इसका ही असर था कि उस दौर में बहुत जल्दी ही तमाम पान दुकानों और बसों में ये गीत सुनने को मिलने लगे। फिल्मकरन अर्जुनका गीतलांबा लांबा घूंघट काहे को कर डाला, क्या कर आई कहीं मुंह काला रेको सुनने वालों की कई सालों तक नहीं थी। फिल्म सबसे बड़ा खिलाड़ी के गीतमांग मेरी भरो, चलो प्यार मुझे करो, अंग से अंग मिला के, प्रेम सुधा बरसा के, दासी तेरी प्यासी रही कितने जनमकी मादकता सुनकर ही महसुस की जा सकती है। कुछ सालों पहले आई फिल्ममर्डरके गीतभींगे होंठ तेरे, प्यासा मन मेरा, लगे अब्र सा ये तन तेरा, कभी कोई रात मेरे साथ गुजार, सुबह तक करूं प्यार’, को आज भी लोग सुनना पसंद करते हैं। हिन्दी फिल्मों में होली हो, उसमें द्विअर्थी संवाद हो तो कहना ही क्या। होली के गीत तो पहले से ही अशलीलता की चाशनी में डुबो कर पेश किया जाता रहा है। फिल्मडरका गीतअंग से अंग लगाना, सजन हमे ऐसे रंग लगानाऔर फिल्मसौतनकामेरी पहले ही तंग थी चोली, उपर गई बैरन होली, जुल्म तूने कर डाला, प्यार में रंग डालाजैसी गीतों ने होली की मादकता को तो महसुस करा दिया लेकिन उसे हिट बनाने में कहीं कहीं अशलीलता ने अपना कमाल दिखा ही दिया। फिल्मखुद्दारकासेक्सी सेक्सी मुझे लोग बोले, हाय सेक्सी हैलो सेक्सी क्यों बोले’, के बोल को बाद में बदल करबेबी बेबी मुझे लोग बोले, हाय बेबी हैलो बेबी क्यों बोलेकरना पड़ा। सनम बेवफा फिल्म का गीतअंगूर का दाना हूं, सुई सुभो देनाजैसी गीतों ने अशलीलता की हद पार कर दी। फिल्मराजा बाबूका गीतसरकाये लेयो खटिया के जाड़ा, जाड़े में बलमा प्यारा लागेहो या फिल्मलम्हेका गीतमोरनी बागामा बोले आधी रात मा इन सभी गीतों में एक ही बात समान है कि इनके बोल अशलील हैं। गीतों के बोल को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की कला को ही सफलता की सीढ़ी मान ली गयी है। हिन्दी शब्दों का सही प्रयोग कर अश लीलता से बचा जा सकता है। लेकिन गीतकार दर्शक वर्ग पर इतने मेहरबान हो जाते हैं कि वे कुछ ऐसे शब्दों का उपयोग कर देते हैं, जिससे गाना अशलील बनने से बच नहीं पाता है। हिन्दी फिल्मों के गीतों के बोल और उसे फिल्माने का तरीका इतना अशलील होता है कि पूरा गीत ही अशलील बन जाता है। फिल्मों में अशलीलता को पेश करने के कई तर्क दिए जाते हैं, लेकिन गीत और संगीत को मशहूर बनाने के लिए किसी भी कीमत पर उससे खिलवाड़ करने का हक किसी को नहीं है।

अपनी आंखों की रौशनी से कीजिए किसी की जिंदगी को रौशन

संसार में देखने को काफी खुबसुरत चीजे हैं लेकिन ये सभी चीजे नेत्रहीनों के लिए कोई मायने नहीं रखती। देश की 7 लाख आबादी कार्निया की खराबी के कारण नेत्रहीनता की शिकार है। इन्हें ठीक किया जा सकता है अगर इनकी कार्निया बदल दी जाये और यह तभी संभव है जब नेत्र दान के द्वारा कार्निया को पुनः स्थापित किया जाये। नेत्रहीन होने वालों में सबसे अधिक संख्या वैसे लोगों की है जो बचपन में ही अपनी आंखों की रौशनी खो देते हैं।

पोषण की कमी, घाव, संक्रमण, चोट या बीमारी से आखों की कार्निया खराब हो सकती है। नेत्रहीनता के शिकार ज्यादातर लोगों में कार्निया बदलने से उनकी नेत्रहीनता खत्म की जा सकती है। लेकिन नेत्र दाताओं की कमी के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाता है और आज भी कई लाख लोग दान में मिली आंखों की कमी के कारण अंधकारमय जिंदगी जीने को मजबूर हैं। भारत में हर साल 4500 लोगों की आंखों का ओपरेशन कर उनकी आंखे ठीक की जाती है वहीं हर साल 30000 नये मरीज अपनी आंखों के ओपरेशन के लिए आते हैं। ऐसे 7 लाख लोग और है जो अपनी आंखों के ओपरेशन का इंतजार कर रहे हैं लेकिन नेत्रदाताओं की कमी के कारण उनका ओपरेशन नहीं किया जा सकता।
भारत में हर साल 80 हजार लोगों की मृत्यु होती है लेकिन अफसोस की इनमें से कुछ हजार ही अपनी आंखों दूसरों के लिए दान करते हैं। लोगों के बीच फैली तमाम तरह की भ्रांतियों के कारण लोग अपनी आंखे दान करने में संकोच या डर महसूस करते हैं। कई लोगों के बीच ऐसी धारणा बन गयी है कि जिनकी आंखों का ओपरेशन हुआ हो, जो चश्मा लगाते हैं या जिन्हें डायबीटीज है। वे अपनी आंखे दान नहीं कर सकते। लेकिन वास्तविकता यह है कि ये सब होते हुए भी कोई व्यक्ति आराम से अपनी आंखे दान कर सकता है। लोगों के एक धार्मिक भ्रांति भी है कि अगर मरने के बाद आंखे निकाल ली जाये तो वह व्यक्ति अगले जन्म में अंधा जन्म लेगा। ये सभी बाते कोरी कल्पना के सिवा कुछ भी नहीं है।

किसी उम्र का कोई भी इंसान अपनी आंखे दान कर सकता है। आंख दान करने की प्रक्रिया बहुत ही आसान है इसके लिए बस अपने नजदीकी नेत्र बैंक से संपर्क करना होता है। जिस व्यक्ति ने अपना नेत्र दान किया है उनकी मृत्यु के 6-8 घंटों के अंदर उनकी आंखे दूसरे के काम आ सकती हैं। नेत्र दान करने वाले व्यक्ति की मृत्यु होने पर उनके रिशतेदारों को मृत्यु के तुरंत बाद निकटतम नेत्र बैंक को संपर्क करना चाहिए। नेत्र बैंक के कर्मचारी बिना किसी ‘शुल्क के नेत्र दाता की आंखे एक छोटी सी प्रक्रिया के द्वारा सुरक्षति निकाल लेते हैं। नेत्र निकालने से मृत व्यक्ति के चेहरे पर किसी प्रकार की विकृति नहीं आती है।
तमाम तरह की भ्रांतियों को निकाल कर अगर बड़ी संख्या में नेत्र दान किया जाये तो लाखों नेत्रहीनों की आंखों की रौशनी वापस मिल सकती है और वह भी हमारी तरह ही इस सुंदर दुनिया के नजारे को निहार सकेंगे।
दिल्ली में इन जगहों पर कोई व्यक्ति अपनी आंखे दान करने के लिए आवेदन कर सकता है।
1. A. Edward Maumenee Eye Bank 2925 0952/ 1155/ 1156/0757

टी वी पर देख तमाशा देख

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (पीएमसीएच) और दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (डीएमसीएच) को बिहार के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में माना जाता है. यहाँ वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर के जूनियर डॉक्टर पिछले ७ दिनों से हड़ताल पर हैं. इस दौरान लगभग ७१ मरीजों कि जान चली गयी. राज्य मानवधिकार आयोग के ह़डताली जूनियर डॉक्टरों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने का निर्देश दिया है। ये खबर कोई न्यूज़ चैनल नहीं दिखा रहा है. क्यों ? क्या ये खबर नहीं है? आप भी न्यूज़ चैनल ज़रूर देखते होंगे. कितनी बार आपने ये खबर देखि या सुनी है?
मैं बहुत कम समय के लिए सभी न्यूज़ चैनलों को दिन में २-३ बार देख ही लेता हूँ. सचिन तेंदुलकर के २० साल पूरे करने पर सभी न्यूज़ चैनलों और न्यूज़ पेपरों ने ३ दिन तक इस न्यूज़ को खीचा. बिग बॉस के घर में क्या चल रहा है इस न्यूज़ बना कर दिन के कई घंटे दर्शकों को मुर्ख बनाया जा रहा है. हद हो गयी ही न्यूज़ चैनल किसी भी लिहाज से न्यूज़ चैनल नहीं लगता. एक प्रोग्राम है सास बहु और साजिश, दोपहर के ३ बजे आने वाले इस प्रोग्राम से मिलतेजुलते प्रोग्राम को ३ न्यूज़ चैनल एक ही समय पर दिखाते हैं...न्यूज़ चैनल परचून के दूकान के सामान लगता है. एक ही खबर को इतना खीचा जाता है कि उससे दर्शको में उब सी होने लगती है.
मैंने एक दो लोगो से जानना चाहा कि वो कौन सा न्यूज़ चैनल पसंद करते हैं और क्यों? उनका जवाब चौकाने वाला था. उन्होंने एक विशेषज्ञ कि तरह न्यूज़ चैनलों कि बखिया उधेर दी. मुझे बहुत अच्छा लगा कि दर्शक ही बहुत जानकर होते हैं. उन्हें भी पता है कि कौन सी खबर महत्वपूर्ण है और कौन सी बकवास...
बहुत दुःख होता है ये सोच कर कि लोग मज़बूरी में उन खबरों को देखते हैं जिसे वो देखना नहीं चाहतें. मीडिया से जनसरोकार ख़त्म होता जा रहा है. और उसकी जगह व्यापार बनता जा रहा है. टी आर पी की अंधी दौर में कुछ चैनल जनसरोकार की खबरें दिखाते है तो उन्हें इसके घाटा ही उठाना पड़ता है और जो चैनल अजब गजब खबरे दिखाते है. वो नंबर १ बन जाते हैं. वाह रे टी वी की दुनिया...

पत्रकारिता का भिश्म पितामाहा चला गया.....

पत्रकारिता के भिश्मपितामाहा नहीं रहे ये खबर आयी तो विश्वास नहीं हुआ. जितना उनके बारे में पढ़ा और उनको जाना उससे तो ये लगा की वो सचमुच में एक जिंदादिल इंसान थे. ऐसा लग रहा है जैसे हमरे अभिवाभाक नहीं रहे.....उनकी आत्मा को भगवान् शांति दे.
मैंने हमेशा उन्हें अपना आदर्श माना है और मानता रहूँगा. पत्रकारिता में आने पर जिस अख़बार में सबसे पहली चिट्टी छपी वो जनसत्ता ही थी. मैंने इस अख़बार के लिए काम भी किया. इस अखबार में मुझे काफी कुछ सिखाया. कई बार सोचा की प्रभाष जी से मिलू लेकिन सोचता ही रह गया. दरअसल उनके बारे में सुन कर ही काफी कुछ जान गया था. उनकी किताबें पढ़कर भी काफी कुछ पता चला. सच कहू तो मैं भी उनकी तरह ही बनाना चाहता हूँ. उनकी सम्पादकीय से लिखना सिखा...उनकी बेबाक लेखनी का मैं कायल हूँ. वो जो भी लिखते है वो लाजवाब होता है. चाहे वो क्रिकेट हो या धर्म..
लेकिन इस रविवार को कागद कारे पढने को नहीं मिलेगा. उस महान आत्मा को मेरा सतसत नमन.......

अब समाचार सुनी, ...हम बानी...............

कभी किसी ने नही सोचा था की एक दिन ऐसा भी आएगा जब समाचार ख़ुद की भाषा में सुनाने को मिलेगा। वैसे क्षेत्रीय भाषाओँ के कई समाचार चैनल हैं लेकिन जब एक नही दो क्षेत्रीय भाषणों के चैनल एक ही राज्य में देखने को मिले तो पता चल जाता है की अपनी भाषा की ताकत कितनी है। मैं बिहार की भाषा मैथली और भोजपुरी की बात कर रहा हूँ। मैंने ऐसे कई लोगो को देखा है जो इन भाषाओँ को बोलते समय तोडा झिझक या शर्म महसूस करते हैं। उन्हें अपनी भाषा पर गर्व की जगह शर्म आती है। कोई पंजाबी, बंगला, तमिल, तेलगु, मलयालम, मराठी जैसी संविधान के वर्णित २२ भाषायें बे झिझक बोल सकता है लेकिन जब बिहार की भाषा की बात आती है शर्म आने लगती है।

उन लोगो के लिए ही हमार के बाद महुआ जैसे समाचार चैनल आए है। और अब मैथली के भी समाचार चैनल शुरू हो गया है। ख़बर क्या है क्या नही इसे राष्ट्रिय चैनल वाले निर्धारित करते हैं। वे जो कहे वही ख़बर है, और जो न दिखाए वो ख़बर नही होती। भाई साहब इतने तो सब को समझ में आता है की ख़बर किसे कहते हैं। लेकिन बेचारे दर्शको का क्या कसूर है उन्हें तथाकथिक चैनल वाले पप्पू बनने में सफल हो ही जाते हैं। आप सोच रहे होंगे की मैं क्षेत्रीय चैनल का इतने बड़ा हिमायती क्यो हूँ। इसमे कोई बड़ी बात नही है। आख़िर आप ही बताइए की केरल या बंगाल में बैठे किसी इंसान को सरोजनी नगर और ग्रेटर कैलाश के सुरक्षा की खबरों से क्या वास्ता हो सकता है। क्या केवल राजधानी की खबरें ही मत्वपूर्ण है.....उड़ीसा, झाखंड या छातिगढ़ की खारों का राष्ट्रिय समाचार चैनल पर कोई स्थान नही है। ऐसा नही है....बेचारे तथाकथिक राष्ट्रिय समाचार चैनल वाले भी वही की ख़बर दिखाना चाहते है लेकिन उनकी चाहत टी आर पी के नीचे दब कर दम तोड़ देती है।

मैंने मैथली चैनल पर एक खबर देखी वो ख़बर सकरी चीनी मिल के बंद होने की थी। रिपोर्टर ख़बर को मैथली के बता रहा था। खास बात ये थी की वो ख़बर किसी लायक से टी वी के लिए नही थी। लेकिन ख़बर बहुत दमदार थी। ऐसी खाबें रोजाना बड़े राष्ट्रिय समाचार चैनल पर आते हैं लेकिन उन्हें चलाया नही जाता क्यो की वे जिनके लिए ख़बर दिखाते हैं उन्हें सकरी के चीनी मिल से कोई मतलब नही है। ऐसी हालत में अगर भोजपुरी और मैथली भाषाओँ के समाचार देखिये जाए तो उसकी सफलता में कोई शक नही है। मेरी तरफ़ से इन चैनलों को और इनमे काम करने वाले सभी कर्मचारियों को दीपावली की ढेरों शुभकामनाय.......
और आप सभी पाठकगन को भी दीपावली मुबारक हो......

ये कैसा दलित प्रेम ?

हमें महात्मा गाँधी के बताये मार्ग पर चलना है। महात्मा गाँधी ने दलितों को एक नाम दिया "हरिजन" इसका मतलब है भगवान् के बन्दे। बीते २ अक्टूबर को कांग्रेस के नेताओ ने दलित प्रेम का ढोंग किया। राहुल के प्रयास और सोनिया गांधी के फरमान से कांग्रेसी सांसद दलितों के घर मेहमान बनकर तो पहुंचे मगर जमीनी हकीकत कुछ अलग ही सामने आई। एक सांसद दलित के घर खाना खाने की बजाय एक पूर्व विधायक के घर जमकर मुर्गे उ़डाने पहुंच गए तो सांसद अजहरूद्दीन ने दलित की बजाय हलवाई से खाना बनवाकर खाया। उधर, उन्नाव में सांसद अन्नू टंडन ने दलित बस्ती में खाना दलित बस्ती में खाना तो जरूर बनाया पर खाना खाने की बारी आई तो ताजा मंगवाई प्लास्टिक की थालियां और गिलास आए। राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल भी खाना बनवाने के लिए हलवाई साथ लेकर दलित बस्ती में पहुंचे और रात में मोटे गद्दों और जनरेटर सेट का इंतजाम कर सोए। दरअसल राहुल गांधी के संकल्प और सोनिया की मंशा ने शुक्रवार को कांग्रेसियों के पसीने निकाल दिए। बापू के जन्मदिन पर मलिन बस्तियों में दलितों के साथ खाना खाने और रात बिताने की कसम या तो वे पूरी नहीं कर पाए या फिर की भी तो हांफते-कांपते महज उसका कोरम पूरा किया। इम्तेहान की इस ƒ़ाडी में ज्यादातर कांग्रेसी सांसद रस्म अदायगी भी नहीं कर पाए।कुछ नेताओं को दलितों के साथ का खाना हजम करते नहीं बना तो कुछ को नींद नहीं आई। बहराइच के सांसद कमल किशोर कमांडो को यूं तो दलित बस्ती में होना था, मगर एक पूर्व विधयाक के घर पर उ़डाई मुर्गे की दावत। फिर निकल प़डे दलित बस्ती की तरफ। मुरादाबाद के सांसद और पूर्व क्रिकेटर अजहरूद्दीन दलित बस्ती तो पहुंचे मगर खाना बनवाने के लिए बकायदा हलवाई के इंतजाम के साथ। उन्होंने मुरादाबाद के कांठ इलाके में एक दलित के घर बैठकर खाना खाया, मगर वह दलित के घर नहीं बना था। यह खाना अजहर के लिए हलवाई के पास से आया था। जाहिर है जब खाना हलवाई का खाया तो वह दलित के आंगन में कैसे बैठते इसलिए बकायदा कुर्सी मेज का इंतजाम किया गया। उधर, केंद्रीय राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल की दलित बस्ती में ठहरने की कवायद जलसे में बदल गई। खाना बनवाने के लिए हलवाई बुलाया गया। श्रीप्रकाश जायसवाल का काम भी हो गया और गांव के लोग भी खुश। रस्म अदायगी का आलम यह रहा कि रात बिताने के लिए कानपुर के जायसवाल के लिए बकायदा शामियाना लगा। पंखे मंगवाए गए। साथ में मोटे गद्दे और जनरेटर सेट का भी इंतजाम किया गया, ताकि रात में बिजली चली भी जाए तो मंत्रीजी की नींद में गर्मी खलल ना डाले। दलितों के जीवन की हकीकत जानने गए मंत्रीजी को शायद यह नहीं पता कि मलिन बस्ती में लोगों के पास जनरेटर तो दूर पंखे तक नहीं हैं। मगर जब गांधीजी पर बोलने लगे तो जमकर बोले। इन सांसदों और राहुल गांधी में जमीन आसमान का अंतर है। राहुल ने दलितों के घरों में चारपाई पर रात गुजारी। पतला सा कंबल ओढ़ा और न पंखे की परवाह की और न ही खाने की। जाहिर है राहुल गांधी को जब अपने सांसदों के घर गुजारी एक रात की हकीकत का पता लगेगा, तो तय है उन्हें काफी तकलीफ होगी।