क्या आपने कभी इस प्रकार के मुहल्ले का नाम सुना है, जरूर सुना होगा। अलग-अलग जगहों में इस मुहल्ले को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है।
मैंने भी कभी इस प्रकार के मुहल्ले का नाम नहीं सुना था। मुझे इस मुहल्ले के बारे में बताया था गोरखपुर के रहने वाले मनीष झा ने। जब मुझे दिल्ली आये कुछ ही दिन हुए थे तो उन दिनों मेरे पड़ोस में मनीष झा नाम का एक बीएससी में पढ़ने वाला लड़का रहता था।
पढ़ाई में मनीष काफी तेज था और अक्सर किसी विषय को लेकर होने वाली बहसों से मुझे इतना तो पता चल ही गया था कि उसे सभी क्षेत्रों का थोड़ा बहुत अच्छा ज्ञान है। अपने गोरखपुर के गांव के बारे में बताते हुए एक दिन मनीष ने एक ऐसी बात बताई जो मैंने सिर्फ किताबों में पढ़ा था।
मनीष ने बताया कि उसका परिवार गांव में बहुत सम्मानित है, चूंकि उसका परिवार पंडितों का है और इसीलिए सभी लोग उनका काफी आदर करते हैं। उसने एक और जानकारी यह दी की उसका गांव एक नदी से दो भागों में बंटा है। नदी के उस पार को चमरौटी टोला कहते हैं। इस पर मैंने उत्सुकता वश मनीष से यह पूछ लिया कि उस मुहल्ले को चमरौटी मुहल्ला क्यों कहते हैं तो वह हंसते हुए कहने लगा कि वहा चमार लोग रहते हैं।
मनीष ने गांव में अपने परिवार की दबंगता की कहानी सुनाई। उसने यह भी बताया कि किस प्रकार उसके गांव वाले चमारों को किसी न किसी बहाने परेशान करने का बहाना ढुढा करते हैं। यहां तक कि किसी चमार की पंचायत तक करने को कोई राजी नहीं होता। उसने बताया कि एक बार जब उसके दादा चमारों की पंचायत कर रहे थे तो किसी चमार ने कुछ अपशब्द कह दिए थे।
मनीष का परिवार तो काफी पढ़ा-लिखा है। उसके बड़े भाई ने पिछले साल ही यूपीपीएससी में सफलता प्राप्त की है। पिता जी भी शिक्षक है। फिर भी मनीष अपने उच्च वर्ण के होने पर काफी गर्व करता है और छोटी जात के लोगों से बात करना अपनी तौहीन समझता है। उसने मुझ से जितनी बातें कही वह सिर्फ इसीलिए कि उच्च वर्ण होने की खातिर मैं उसकी हरेक बात का पक्ष लूंगा।
पढ़े-लिखे तबकों के बीच भी जात-पात का जहर इस कदर कायम है कि वह मरते दम तक अपना असर नहीं छोड़ता। इस एक उदाहरण आप दैनिक जागरण के 3 मई 1995 के मेरठ संस्करण के अखबार में देख सकते है। इसमें छपी खबर के मुताबित 2 मई 1995 को मेरठ के लालकुर्ती के बड़े बाज़ार में स्थित श्रीराम संकीर्तन मंदिर में परशुराम जयंती के अवसर पर माछरा डिग्री कॉलेज के अंग्रेजी के प्रोफेसर पंडित रविदत्ता शर्मा ने अपने भाषण में कहा है कि ''ब्राह्मणाें में जन्मजात बुध्दि होती है, लेकिन दूसरी जातियों को बुध्दि का विकास करना पड़ता है।''