छत्तीसगढ़ में प्रकृति और आदिवासियों का नाता माँ और बेटे से कम नही है। ४० फीसदी जंगलों से घिरे इस राज्य की पहचान यहाँ के वन और यहाँ रहने वाले आदिवासी हैं। छत्तीसगढ़ की धरती पर रहने वाले कमार, झारा, हल्बा, बैंगा, पंडों, बिरही और धुर्वा जैसे आदिवासी खेतीबाड़ी के सहारे अपना जीवन चलते हैं। हर आदिवासी अपने घर में सल्फी, कटहल, आम और पालतू जानवरों के बिना अधुरा है। दरअसल यही सब कुछ एक आदिवासी परिवार की आर्थिक सबलता की पहचान है।आदिवासियों की प्रकृति से निकटता ही छत्तीसगढ़ की पहचान है और इस पहचान को बनाये रखने के लिए यहाँ के लोग काफी समर्पित हैं। यह समर्पण की भावना ही प्रकृति और मनुष्य के अटूट रिश्ते को एक मज़बूत आधार देती है। अपनी पारंपरिक कलाओं में निपूर्ण आदिवासी के लिए इनका काफी महत्व है। छत्तीसगढ़ को कलाओ की धरती कहा जाए तो कोई आतिसयोक्ति नही होगी। इन्ही कलाओ में से एक है....धुरा हस्तशिल्प कला। धुरा एक येसी कला है जिसे प्रकृति से मिलने वाले अवशेषों से तैयार किया जाता है। धुरा हस्तशिल्प से तैयार चित्र इतने प्रकृति होते हैं की उसकी एक झलक ही किसी को आकर्षित करने के लिए काफी होती है। इस कला से बनी चित्रों को देख कर किसी का भी दिल खो जाए। धुरा से बनी कलाकृतिया इतनी जीवंत होती हैं की ख़ुद को उसमे महसूस करेंगे और प्राकृतिक नज़रों का लुत्फ़ भी उठा सकते हैं.....