Sunday 15 July 2007

मेरा नाम मियां है........




जी हॉ, ठीक यही कहा था एक मुस्लिम व्यक्ति ने मुझसे जब मैंने उनसे उनका नाम पूछा था। बात ठीक एक साल पहले की है। बचपन से सरकरी मुलाजिम बनने की तमन्ना पालने वाला मेरा एक पुराना मित्र कुछ महीनों के लिए दिल्ली आया था। दिल्ली आने से पहले ही उसने यह शर्त रख दी थी वह सिर्फ मेरे साथ ही रहेगा। लिहाजा हम दोनों से दिल्ली के एक इलाके में मकाना लिया जो उसके और मेरे लिए काफी सस्ता था। यह इलाका दिल्ली की सीमा के पास स्थित है।

जिस मोहल्ले में हमने मकान लिया था वहां कुछ दूरी तक कुछ मुस्लिम जनसंख्या भी थी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां एक मस्जिद और एक कब्रिस्तान भी था। मेरा दोस्त वैसे तो हिन्दू में उच्च वर्ण का होने की खातिर अपने धर्म को सबसे अच्छा मानता है, दूसरे धर्म क्यों खराब हैं उसका उसके पास कोई तर्क नहीं होता है। हमने कुछ मिनटों में ही अपना मकान किराए पर ले लिया।

हम दोनों ने तय किया कि समय की बचत के लिए हम दोनों खाना मंगवाकर खाएंगे। मोहल्ले में ही खाने के कई होटल थे। मैंने एक बड़ा और अन्य की अपेक्षा एक साफ-सुथरे होटल सागर को चुना और हमदोनों उस होटल में टिफिन सिस्टम के बारे में बात करने के लिए घुस गये। मैंने अपने दोस्त के हावभाव पर गौर किया कि वह होटल को बड़े ही अजीब नजरों से देख रहा था। खैर मैंने बात शुरू की खाने में क्या-क्या रहेगा, खाना कितने समय तक मिलेगा और प्रति टिफिन कितना रुपया लगेगा। मैं बात ही कर रहा था कि मेरे दोस्त ने मेरे कान में कहां कि यह आदमी किस जाति का पूछ लो। मैंने बड़े आश्चर्य से उसकी ओर देखा। मैंने भी अपने दोस्त की खातिर उस व्यक्ति से उसका नाम ही पूछना बेहतर समझा।

उस व्यक्ति से मैंने उसका नाम पूछा कि आपका नाम क्या है ? वह सब्जी काट रहा था और हमसे बात भी कर रहा था। मेरे सवाल का उसने कोई जवाब नहीं दिया। इस पर मैंने अपना सवाल दोबारा जोर लगा कर पूछा तो उसने सिर झुकाये ही धीरे से कहा कि भाई मियां है'.......... इसके बाद मेरे मित्र का चेहरा देखने लायक था। मुझे कुछ समझ नहीं आया तो मैंने उससे पूछा कि आपका कोई तो नाम होगा। तो उसने बताया कि उसका नाम कमालुद्दीन है। इतना सुनते ही मेरे मित्र ने कहा कि चलो फिर बाद में बात करेंगे।

मैंने जब अपने मित्र से कहा कि चलो अब तो होटल का इंतजाम हो गया तो मेरे मित्र ने कहा कि मैं उस होटल में नहीं खाउंगा। मैं पूछा क्यों तो उसने कहा कि बस मैं नहीं खा सकता। हालांकि इस बात पर मुझे काफी गुस्सा भी आया था लेकिन मैंने अपनी भावनाओं पर काबू करके बात को वहीं खत्म कर दिया। उसी दिन से ही मैंने उस होटल में खाना शुरू कर दिया और मेरा मित्र उसके आगे वाले होटल में खाता था।

थोड़ी लंबी कहानी सुनाने का उद्देश्य आपका कीमत समय बरबाद करना नहीं है बल्कि मैं बस एक संदेश देना चाहता हूं कि आये दिन जितने भी आतंकवादी पकड़े जाते है उनके मुस्लिम समुदाय से संबंधित होने के कारण अब लोगों ने प्रत्येक मुस्लिम को ही शंक की नजर से देखना शुरू कर दिया है। मुसलमानों में साक्षरता दर सबसे कम है, लेकिन यही एक समुदाय है जिसमें बेरोजगारी की दर सबसे कम है क्योंकि ज्यादातर लोगो कोई न कोई स्व रोजगार कर ही लेते हैं। अब तो एक मुसलमान भी जानने लगा है कि दूसरे लोग उसको किस नजर से देखते हैं।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि कमालुद्दीन जैसे कितने लोगों को रोजाना मेरे मित्र जैसे लोगों के उस शक भरी नगाहों से गुजरना पड़ता होगा। आखिर उस होटल वाले कमालुद्दीन का कसुर क्या है......................

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