Thursday 30 August 2007

दबी आग भड़की गोहाना में.................

गोहाना दो साल पहले भी सुर्ख़ियों में छाया था उस समय दलितों के 60 घरों को जाटों ने आग के हवाले कर दिया था। जाट समुदाय का दो साल से सुलग रही बदले की आग फिर से कहर बन कर दलित युवक पर बरसी।

कुछ लोग दलितों को दोष देते है कि इन लोगों का तो काम ही फसाद करना है। कितने लोग तो उसक हरिजन एक्ट को भी कोसते हैं जिससे कथित रूप से हरिजनों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए कुछ अधिकार दिए गये हैं।

किसी भी आपसी झगड़े को जाति के नाम पर भड़काना कुछ लोगों को बहुत अच्छी तरह आता है। पिछले दिनों जब भागलपुर में जब एक मुस्लिम लड़के को चेन झपट मारी में लोगों के साथ मिलकर एक पुलिस सब इंस्पेक्टर ने बुरी तरह पीटा तो इसे भी सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई। इस घटना को लेकर दंगा को लेकर अतिसंवेदनशील समझे जाने वाले भागलपुर में दंगे जैसी स्थिति बन गयी थी।

वक्त बदला...........ज़माना बदला...............पर वो न बदले? बदलते ज़माने के साथ कदमताल करने का लोग लाख ढाेंग कर लें लेकिन कुछ पुरातनपंथी विचारधारा के लोग अपने परदादाओं की परंपराओं को ढोने के लिए मर मिटने को सिर पर कफन बांधकर तैयार रहते हैं। कौन समझाये इन नासमझो को, कि पेट भरे आदमी की ही कोई जाति होती है।

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