Monday 28 October 2013

अति सर्वत वर्ज्यते


अगर आप किसी खास धर्म, जाति या उपजाति से आते हैं और बात उसके अनुसार नहीं करते तो आपको शक की निगाह से देखा जाता है. उदाहरण स्वरुप मान लीजिये आप हिन्दू जाति से उच्च वर्ग से आते हैं, तो आपको एक खास मानसिक स्थिति में होना ही होगा. जैसे 
आप हिन्दू होने से सभी कर्मकांड करेंगे
आप उन्हीं धकियानुसी परम्पराओं का पालन करेंगे
आप मुस्लिम से किसी न किसी प्रकार का नफरत करेंगे. 
आप हर बात में अपने धर्म और जाति को सर्वश्रेष्ठ बताएँगे.
कुल मिला कर आप लकीर से फ़क़ीर ही रहेंगे.

इसके ठीक उलट अगर आप मुस्लिमों का ज़िक्र करेंगे तो आपको शक की निगाह से देखा जायेगा और आपका हिंसक विरोध इसलिए नहीं किया जा सकता क्यों की आपका जन्म हिन्दू में हुआ है. अगर किसी व्यक्ति का जन्म मुस्लिम में हुआ है तो इसमें उसकी क्या गलती है, मान लीजिये की हिन्दू में भी अगर किसी छोटी जाति में हुया है तो इसमें भी उसकी क्या गलती है. आपका जन्म हिन्दू जाति के किसी उच्च वर्ग में हुआ है तो उसमे आपका क्या योगदान है?

पहले मैं ऐसा सोचता था की ये सोच छोटे शहरों की है लेकिन दिल्ली, मुंबई और बड़े महानगरों में भी ऐसी ही मानसिकता से लोग हैं, यही नहीं विदेश भी इनसे अछूता नहीं है. रहेंगे विदेश में लेकिन लड़की अपनी ही जाति की चाहिए. मुझे तो तब ताज्जुब हुआ जब विदेश से २ साल की पढाई करके एक लड़की ने कहा की मुस्लिम बहुत गंदे और बुरे होते हैं. तो मैंने उसे समझाने की कोशिश की लेकिन मैं असफल रहा क्योंकि उसके दिमाग में नफ़रत के बीज तो बचपन में ही दाल दिए गए थे. 

कट्टरता किसी भी धर्म का क्यों न हो मैं उसके सख्त खिलाफ हूँ. मैं न तो हिन्दू कट्टरता का समर्थक हूँ और न ही मुस्लिम, सिख, जैन, की कट्टरता का. हम हर बात में टेक्नोलॉजी और तरककी की बात करते हैं थकते लेकिन इस खास मुद्दे पर आकर हमारी मानसिकता बाबा आदम ज़माने में क्यों पहुच जाती है?

ये विषय ऐसे हैं जिस पर कोई सार्वजनिक रूप से बहस नहीं करना चाहता या यूँ कहें की बचते रहना ही चाहता है. फेस बुक पर बड़े बड़े विद्वान् हैं इसलिए मैंने अपने ब्लॉग पर ये बातें लिखी हैं. ऐसी बहुत सारी बातें है जिसे मैं बताना चाहता हूँ.


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