Friday 29 June 2007

टी वी में भूत

टेलिविजन के उद्योग में टीआरपी (टेलिविजन रेटिंग प्वाइंटस) चक्कर बहुत खराब है। इस प्वाइंटस से ही किसी चैनल को विज्ञापन यानी रोजी-रोटी मिलती है। प्रत्येक शुक्रवार का दिन टीवी चैनलों के लिए महत्वपूण होता है क्योकि उसी दिन यह पता चलता है कि अमुक चैनल ने एक सप्ताह में कितनी मेहनत की और उस सप्ताह कितने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खीच पाने में सफल रहा।

दर्शकों को क्या पसंद आता है और क्या नहीं, यह खबरिया चैनल वाले बखुबी जानते हैं। सभी चैनलों ने अपने-अपने दर्शकों के मनोरंजन के लिए कई तरह के कार्यक्रम बना रखे है। कोई इसे ''काल, कपाल और महाकाल'' के नाम से दिखा रहा है तो कोई इसे 'खौफ' के नाम से दिखा रहा है। इन कार्यक्रमों में एक ही समानता है कि ये सभी कार्यक्रम आत्माओं और भूतों को समर्पित है। कई ऐसी खबरों को भी ये समाचार चैनल वाले भूतिया खबर बना देने में माहिर है जिससे भूतों का दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं होता है।

दर्शकों को चैनल यह पहले ही बता देता है कि आज रात 10 बजे हम आपको दिखाएंगे ''चुड़ैल का बदला''। इसे सुनते ही दर्शकों के रोंगटें खड़े हो जाते है। और ठीक रात 10 बजे दर्शक उसी चैनल के सामने दिल थाम टकटकी लगाए चुडैल दर्शन के लिए बैठ जाता हैं। चैनल, दर्शकों की इस उत्सुकता को भुनाना अच्छी तरह जानता है। कार्यक्रम के पहले 10 मिनट तक कार्यक्रम का एंकर कार्यक्रम की भूमिका बांधने में खत्म कर देता है। इसी बीच एंकर बड़ी चालाकी से पहला ब्रेक भी ले लेता है और दर्शक उनकी बातों में इस कदर बंध चुके होते हैं कि वह किसी दूसरे चैनल पर भी नहीं जाते।

देश के लगभग 7 हजार घरों में लगे ''पीपलोमीटर'' के माध्यम से इस बात का निर्णय लिया जाता है कि दर्शकों ने किस कार्यक्रम को ज्यादा पसंद किया। इसी 7 हजार घरों के दर्शकों पर निर्भर करता है कि किस चैनल को कितने प्वाइंट मिलेंगे। वैसे तो कई और चीजों की तरह ही टीआरपी में भी कई धालमेल हैं। खैर, इस बारे में चर्चा बाद में। भूत, टीआरपी बढ़ाने की एक ऐसा तरीका है जो कभी फेल नहीं होता है। जिस चैनल के प्रतिभावान रिपोर्टर इस भूत खोजने में कामयाब हो जाते है तो उस चैनल के वारे न्यारे हो जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि सभी चैनल भूत सें संबंधित कार्यक्रम दिखाते ही हैं। अभी भी कुछ समाचार चैनल है जो इस महान कार्य को अंजाम देने से बच रहे हैं, जिसका आर्थिक खमीयाजा भी उन्हें भुगतना पड़ रहा है। उन चैनलों का टीआरपी की सूची में बीसवां या चालीसवां नंबर आ रहा है। वहीं चैनल दर्शकों की नजर में खरा उतरता है जो रोज कोई न कोई भूत पकड़कर उसको दिखने के लिए प्रस्तुत करता रहता है। आखिर बेचारे चैनल वाले भी क्या करें रोजाना भूत को लाना संभव भी नहीं होता है न।

अंधविश्वास बिकता है इसमें कोई शक नहीं। इसी का प्रमाण है कि आज उसी चैनल को सबसे ज्यादा टीआरपी मिलता है जो रोज भावनाआें और जिज्ञासाओं का शोषण कर बेचना जानता है। आप रोज किसी न किसी चैनल पर नये-नये चमत्कार होते हुए देख सकते हैं। कभी दिखाया जाता है कि कोई बाबा तेजाब से इलाज कर रहा है तो कभी दिखाया जाता है कि कोई बाबा मरीजों का इलाज तलवार से करते है। हालांकि चैनल दर्शकों से बार-बार यह अपील भी करता है कि वह इस प्रकार के अंधविश्वास से बचें। लेकिन दर्शकों का इस प्रकार की चमत्कारों पर बरसों से विश्वास बना हुआ है जो चैनल की अपील से खत्म नहीं होने वाला है।

एक चैनल ने तो न जाने कहां से एक वीडियो फिल्म दिखाना शुरू कर दिया जिसमें एक बच्चे की आकृति को बड़े अजीब ढंग़ से दिखाया जा रहा था जिससे लगे कि वह बच्चे की आत्मा है। इस दृश्य को देखकर जो भूत पर विश्वास भी नहीं करते होंगे वह भी करने लगेंगे। वह सभी विषय जो लोगों के कौतुहल के कारण होते है, उस पर टीवी दर्शक तुरंत आकर्षित होते हैं। दर्शक चाहे पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़। दोनों की मानसिकता इन मामलों में समान्यत: एक ही हो जाती है।

जब कभी कोई चैनल यह दिखाता है कि फंला जगह साईं बाबा की माला की लंबाई लगातार बढ़ती जा रही है तो दर्शक इसे देखने के बाद यह जरूर कहते हैं कि ''जय साईं बाबा''। इस बारें में लोगों का विश्वास और आस्था चैनल से कहीं अधिक उपर हो जाता है। इसका एक उदाहरण इस प्रकार समझा जा सकता है कि साईं बाबा की भूमिका निभाने वाले कलाकार ने जब साईं बाबा के मेकअप में एक रैली में भाग लिया तो लोगों ने उनको इस तरह पूजना शुरू कर दिया कि वह सचमुच के साईं बाबा ही हो। बाद में उस कलाकार ने अपना मेकअप हटा कर लोगों को यह बताया पड़ा कि वह एक साधारण सा कलाकार ही है।

जिस वस्तु से लोगों का विश्वास जुड़ा होता उस बारे में वह कोई तर्क नहीं सुनना चाहते, चाहे उसमें कितनी भी सच्चाई क्यों न हो। ऐसा नहीं है कि समाचार चैनल केवल एक पक्ष ही दिखाते है लेकिन दर्शक दूसरे पक्ष को जानने और समझने की बजाये पहले पक्ष को ही सच्चाई मानकर बैठ जाते हैं। इन समाचाराें का सबसे नाकारात्मक प्रभाव यही होता है दर्शक समाचार दिखाने के उद्देश्य को नहीं समझ पाते, जिससे उनके अंधविश्वास को और भी बढ़ावा मिलता है।

चैनलों के इस गलाकाट प्रतियोगिता में टिके रहने के लिए चैनल किसी भी समाचार को दिखाने से पीछे नहीं हटना चाहते और चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी हथकंडा क्यों न अपनाना पड़े। भारत की आधी आबादी को अक्षरों का ज्ञान नहीं है इस माहौल में टीवी चैनल वाले चांदी काट रहे हैं। चैनल ज्यादातर वैसे मुद्दोें को चुनते है जिससे अधिक से अधिक दर्शक खीचे चले आये और उनका काम बन जाये। कई मुद्दे तो ऐसे होते हैं जो किसी पति-पत्नी के घर के अंदर की लड़ाई होती है जिसे चैनल अपने स्टूडीयो में लाकर सार्वजनिक बना देता है।

आजकल तो चैनलों ने एक नया चलन शुरू कर दिया है। किसी अपराध के आरोपी पुलिस स्टेशन की बजाए समाचार चैनलों में जाकर आत्मसमर्पण कर रहे हैं और चैनल उन्हें पूरा सहयोग और सुविधा प्रदान कर रहा है। आने वाले वक्त में और कितने ही तरह से तमाशे इन समाचार चैनलों के माध्यम से देखने को मिलेंगे। तब तक के लिए इंतजार किजिए रात 10 बजे तक का।

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