Tuesday 13 November 2007


बाल दिवस मनाया जा रह है....सरकार बच्चों की स्थिति सुधरने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है...फिर क्या वजह है कि आज भी करीब ६ लाख बच्चे स्कूल की दहलीज से दूर हैं... भारत के बच्चों का ख्याल रखने के लिए बाल विकास मंत्रालय काम कर रह है....लेकिन वह उन बच्चों को स्कूल तक पहुचाने में सफल नहीं हो पा रह है....मंत्रालय ने बच्चों को स्कूल तक पहुचाने के लिए करोडों खर्च किये हैं लेकिन स्थिति धाक के तीन पात वाली रही है....

आज फिर पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन के बहाने बच्चों की सुध ली जायेगी....वास्तविकता है की जहाँ ये समारोह आयोजित किये जायेगे वह तक शायद ही वो बच्चें पहुंच पाए जिनके लिए यह आयोजन किया जा रह है....उन बेचारों को तो गेट से ही दुत्कार कर निकाल दिया जाएगा....बात वही है कि जिनका पेट भरा हुआ है उसे ही खिलने कि कोशिश की जा रही है और जिन्होंने उसका स्वाद भी नहीं चखा उन्हें दुत्कार दिया जा रहा है....

आकडे बताते हैं कि हर साल ४४ हजार बच्चें अपने परिवार से बिछुड़ जातें हैं...इनमें से ११ हजार भाग्यशाली वापस अपने परिवार को मिल जातें है लेकिन ३० हजार का तो कोई पता नहीं चलता...इन्हीं बच्चों से भीख मँगाने, अवैध व्यापार कराने जैसे कामों को कराया जाता है....

इन मासूम बच्चों का क्या कसूर है....जिन्हें संसार के सारे दुखों को उठाने को मजबूर कर दिया जाता है....राजधानी दिल्ली में राजपथ पर बच्चें हाथों में राष्ट्रीय ध्वज बेच्तें हैं....क्या ये बच्चें उन निति निर्मातों को नहीं दिख्तें या फिर वे उन्हें देखना नहीं चाहतें....शर्म आनी चाहिऐ उन्हें जो बाल दिवस के मौक़े पर इन मासूमों को झूठा दिलासा देतें हैं....

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