Sunday 25 November 2007

हमाम में सभी नंगे हैं.....


बांग्लादेश की लेखिका तस्लीमा नसरीन पश्चिम बंगाल में नहीं रह सकतीं क्योंकि कुछ लोग उनके विचारों से सहमत नहीं हैं और सत्तारूढ मार्क्सवादी पार्टी ने भी हाथ खङ़े कर दिए हैं.
कल उन्हें राजस्थान पहुँचाया गया था। फिर दिल्ली ले जाया गया।

आखिरकार कोलकता के वामपंथियों ने भी अपना धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा उतार ही दिया...सच ही कहा गया है हमाम में सभी नंगे हैं.....

तसलीमा मुसलमानों के खिलाफ लिखती हैं पश्चिम बंगाल में ढाई करोड. मुसलमान हैं और राज्य सरकार उनकी नाराज़गी झेल नहीं सकती. फिर जब नंदीग्राम में हुई हिंसा में मारे जाने वालों में बड़ी संख्याँ में मुसलमान हों तो ज़ाहिर है कि राज्य सरकार की दिक्कतें और बढ जाती हैं. वो भी एक ऐसे माहौल में जहाँ राजनीतिक नेता हर मामले को वोट बैंक से जोड़कर देखते हों.
विमान बसु ने कहा कि तस्लीमा नसरीन राज्य की क़ानून व्यवस्था के लिए ख़तरा हैं। उन्हें पश्चिम बंगाल छोङ देना चाहिए। तस्लीमा राजस्थान, दिल्ली और आगे न जाने कहाँ-कहाँ जाने को मज़बूर हो जाएँ. पर सवाल यह है कि क्यों समाज में असहिष्णुता बढ रही है? क्यों बात-बात पर धर्म पर ख़तरा मँडराने लगता है ? या फिर जब लोग वोट बनकर रह जाते हैं तो क्या लोकतंत्र मज़ाक बनकर रह जाता है?
आजकल के माहौल में जो ज़्यादा ज़ोर से चिल्लाता है, उसको ही सुना जाता है. जो ज़्यादा शोर मचाते हैं या ज़्यादा धमकी देते हैं, सरकार उन्हीं की बात सुनती है. सरकार में कोई भी दल हो. फिर चाहे बंगाल में वाम दल हो या गुजरात में भारतीय जनता पार्टी हो या महाराष्ट्र में कांग्रेस."
जानेमाने चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन इस देश में नहीं रह सकते. हमने उन्हें पद्म विभूषण से नवाज़ा है. उनके चित्रों के बारे में कुछ लोग कहेंगे कि ये ग़लत है, हम इसको सहन नहीं कर सकते, ये हमारी इज़्जत के ख़िलाफ़ हैं, वगैरह वगैरह... एक सवाल यह भी है कि कोलकाता की सड़कों पर जो विरोध था, वह तस्लीमा के ख़िलाफ़ था या नंदीग्राम में मुसलमानों पर हुई हिंसा की छाया उस पर थी. या फिर रिज़वानुर रहमान की एक हिंदु युवती से विवाह के बाद संदेहास्पद स्थिती में मौत और पुलिस की संदिग्ध भूमिका के जवाब में था.
यदि राज्य ही अपने लोगों पर हमला करने लगे, तो इसका नतीज़ा यह होता है कि पीड़ितों में ज़बावी हिंसा पैदा होती है. इसका परिणाम यह होगा कि देश में हिंसा, असहिष्णुता और चरमपंथ बढेगा
पुणे के भंडारकर संस्थान में शिवाजी पर लिखी पुस्तक को लेकर तोड़फोड़ हो या फिर वडोदरा के सुप्रसिद्ध एमएस विश्वविद्यालय में एक छात्र द्वारा बनाई कलाकृतियों पर विवाद हो, या हैदराबाद में तस्लीमा नसरीन पर हुआ हमला या फिर कोलकाता का घटनाक्रम, ये सभी दर्शाते हैं कि लोकतंत्र में राजनीतिक नफ़ा-नुकसान किस तरह अहम होता जा रहा है.

1 comment:

Sanjeeva Tiwari said...

वाजिब है आपका चिंतन ।

www.aarambha.blogspot.com