Friday 14 December 2007

पैसे चाहिये? ख़ुशी से ले जाइये......




पैसे चाहिये? ख़ुशी से ले जाइये, जितने चाहो उतने ले लो, जैसी भी ज़रूरत हो पैसे हम देंगे वह भी बिना किसी गारंटी के.......


शायद आप समझ गए होंगें कि मेरा इशारा किस ओर है....लोगों में अधिक से अधिक पैसे कमाने की होड़ सी लगी है...सभी एक दूसरे से दिन रात उसकी तन्ख्वा पूछ रहे हैं....जो जितनी तन्ख्वा पा रह है उससे अधिक पाना चाहता है...दस बीस हजार कमाने वालों की कोई पूछ नहीं है....लोग उसकी तरह बनना चाह रहे हैं जिसकी salary लाखों में है...रुपयों के पीछे दौड़ने की अंधी दौड़ लगी हुई है...इस दौड़ में सब के दुसरे से आगे निकलना चाहते हैं॥


कुछ लोग एक सालों से एक ही जगह पर दौड़ रहें हैं....वे इस दौड़ में आगे निकलने के लिए बैसाखी का सहारा ले रहे है और वो बैसाखी है क़र्ज़ की.....वैसा क़र्ज़ जो केवल दिखावे के लिए लिया जा रहा है...कोई कार के लिए तो कोई विदेश घूमने के लिए शौकिया कर्ज़दार बन रहे है।


वो अलग बात है कि ये आधुनिक कर्ज़दार विद्र्व के किसानों की तरह आत्महत्या नहीं कर रहें हैं....किसान बेचारों को तो कोई निगोरा बैंक क़र्ज़ भी नहीं देता....हाँ शूट बूट वाले बाबु साहब को भले वह बिना किसी खास गारंटी के कर्जा यूं दे देता है जैसे क़र्ज़ अदा कर रहा हो....ओर यही कारन है कि बाद में बैंक को अपना पैसा वसूलने के लिए गुंडे भेजना पड़ता है....हालांकि अदालत इसके सख्त खिलाफ है....बैंक भी क्या कर सकता है जैसी करनी वासी भरनी...


5 बैंकों के क्रेडिट कार्ड रखने वाले मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा कि तुम क्रेडिट कार्ड क्यों नहीं ले लेते बैंक वाले फ्री में बाँट रहे हैं....मैं कहा भाई मुझे सूद पर पैसा लेकर खर्च करना नहीं आता...मेरे जवाब पर उसने बहुत आश्चर्य किया....


कसबे की मानसिकता कह लीजिये या गाँव की लेकिन अभी भी वह क़र्ज़ बेटी की शादी या घर बनने जैसे अहम मौकों पर ही लिए जाते हैं....और जो लोग क़र्ज़ से कोई सामान लेते है उन्हें अपनी गरीबी का सार्वजनिक इजहार करने वाला कहा जाता है....


पैसे सभी को चाहिऐ क्योंकि ये ज़िंदगी को आगे बढ़ाने के लिए बहुत ज़रूरी है...लेकिन भैया कर्जा का पैसे लेकर अमीर बनने से अच्छा है कि थोडे गरीब ही रहें....

2 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...

कर्ज अगर उपभोगार्थ है तो निश्चय ही गलत है। कर्ज अगर साउण्ड इंवेस्टमेण्ट का हिस्सा है - तो उचित है। बांगलादेश के मुहम्मद यूनुस जी के माइक्रोफिनांस का मैं प्रबल समर्थक हूं।
आपने अच्छा लिखा है।

Sanjay Gulati Musafir said...

आशा है मेरे इस लेख पर आपकी कभी नजर पडी हो। नहीं तो जरूर पढें।

http://sanjaygulatimusafir.blogspot.com/2007/10/blog-post_29.html

दोस्त हर बार टिप्पणी के लिए Word-verification तो बहुत मुश्किल है।