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Tuesday, 24 November 2009

हम किसी से कम नहीं....

महिलाएं आज भले ही हर क्षेत्र में उंची तनख्वाह और उंचे ओहदे पर काम कर रही हैं। लेकिन अभी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां महिलाओं को ये कह कर मना किया जाता है कि उनके प्रजनन से संसाधन का अपव्यय होगा। जी हां हम आज बात कर रहे हैं, सुखोइ विमान उड़ाने पर वायु सेना के उपाध्यक्ष एयर पी. के. बारबोरा के बयान पर। उन्होंने कहा कि महिलाओं के परिवार बढ़ाने की क्षमता के कारण फाइटर पायलट के प्रि’ाक्षण पर किए जाने वाले समय और खचZ का अपव्यय होगा। आज राष्ट्रपति प्रतिभी देवी सिंह पाटिल ने भी सुखोई में उड़ान भर कर ये साबित करने की कोशिश की है की महिलाये किसी से कम नही हैं..
महिलाओं को बराबर का हक दिलाने की बात करने से कुछ नहीं होगा। महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी सेवा को जिम्मेदारी के साथ निभा रही हैं। वायुसेना में भी महिलाएं काम कर रही हैं लेकिन सिफZ प्रजनन के कारण अगर उसे फाइटर पायलट के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, अगर किसी लड़की में एक फाइटर पायलट बनने के सभी गुण मौजूद हैं तो उसे रूका नहीं जाना चाहिए।
माना कि एक फाइटर पायलट के प्रि’ाक्षण पर लगभग 11 करोड़ रुपये का खचZ आता है। ये आधार बिल्कुल ठीक नहीं है कि बच्चे को जन्म देने के लिए महिलाएं एक साल तक सुखोइZ नहीं उड़ा पाती जिससे समय का अपव्यय होता है। अगर ऐसा है तो महिलाओं को कोइZ काम नहीं करना चाहिए। अंतरिक्ष यात्री, पुलिस सेवा और सेना, ये कुछ ऐसी सेवाएं हैं जहां महिलाओं को काफी ‘ाारीरिक श्रम करना पड़ता है। लेकिन वे अपनी भूमिका का बेहतर तरीके से निभा रही हैं।
भारत में अभी तक सेना में महिलाओं की संख्या और दे’ाों की तुलना में काफी कम है।

महिलाएं हर क्षेत्र में सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं, लेकिन सेना जैसे क्षेत्र में उनकी उपस्थिति बहुत कम है। अभी तक सेना में महिलाओं को केवल प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया गया है। उन्हें युद्ध से अलग रखा गया है। हाल ही में सीमा सुरक्षा बल ने महिला बटालियन को भारत-पाकिस्तान की सीमा पर तैनात किया, तो इस बहस ने जोर पकड़ लिया कि क्या महिलाओं को युद्ध क्षेत्र जाने दिया जाना चाहिए?
महिलाओं की युद्ध क्षेत्र से दूरी को उचित बताने वाले लोगों का तर्क है कि प्रकृति के अनुसार महिलाएं युद्ध के लिए पूरी तरह सक्षम नहीं हैं। उनमें पुरुषों जैसी शारीरिक शक्ति का अभाव है। सबसे पहले महिलाओं को डॉक्टर के पदों पर 1943 और नर्सों के रूप में 1927 में शामिल किया गया। 1992 के बाद शोर्ट सर्विस कमीशन के माध्यम से उन्हें युद्ध से अलग अधिकारी पदों पर नियुक्ति दी गई । इसके बाद महिलाओं के लिए सेना के शिक्षा, कानून, सिगनल, इंजीनियरिंग, तकनीकी और खुफिया विभागों का दरवाजा खुला। भारतीय सेना में अभी 2.44 प्रतिशत, नेवी में 3 प्रतिशत और वायुसेना में 6.7 प्रतिशत महिलाएं कार्यरत हैं। वर्तमान में इंडियन नेवी में 258 महिला अधिकारी हैं। ओम्र्ड फ़ोर्स मेडिकल सर्विस में 752 महिला चिकित्सा अधिकारी हैं। जिसमें 86 महिला दंत चिकित्सा और 2,834 महिला नर्सिंग सेवा में कार्यरत हैं।
अगर विदेशों की बात की जाए तो वहां की सेनाओं में महिलाओं की संख्या काफी अधिक है। अमेरिका में लगभग 2 लाख महिलाएं अमेरिकी सेना में हैं, जो अमेरिकी सेना का 20 प्रतिशत के बराबर है। इनमें से कई महिलाएं इराक में तैनात हैं। इस्राइली सेना में भी महिलाओं की संख्या कम नहीं है। लेकिन उन्हें युद्ध क्षेत्र में नहीं भेजा जाता। बि्रटेन में महिलाओं को 1990 में शामिल किया गया। यहां की सेना की तीनों कमानों में लगभग 2 लाख महिलाएं कार्यरत हैं। कनाडा की सेना में महिलाओं की संख्या 13 प्रतिशत है। इसमें सेना के द्वारा लिए जाने वाले फैसलें में भी महिलाएं अपनी भूमिका निभाती हैं। रूस और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी महिलाओं को युद्ध भूमि से दूर रखा गया है। कई इस्लामिक देशों में भी महिलाओं का सेना में प्रवेश वर्जित किया गया है।

इसके पीछे कई कारण गिनाए जाते हैं। महिलाओं को सेना में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जिसमे मनोवैज्ञानिक और शारीरिक कारण प्रमुख हैं। हालांकि विषम परिस्थितियों में अपने परिवार से दूर रहने वाले पुरूश भी कई बार इन समस्याओं से दो-चार होते हैं लेकिन उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। हर बार औरतों को यह एहसास कराया जाता है कि वह स्त्री है इसीलिए वह कोई काम नहीं कर सकती। यही वजह है कि आज महिलाओ ने अपनी काबलियत और अपनी बुद्धमिता साबित कर दी है। जहां तक शारीरिक ताकत की बात है तो बंदूक से गोली चलाने के लिए शारीरिक ताकत से ज्यादा दिल और दिमाग से मजबूत होना ज्यादा जरूरी है। महिलाओं को युद्ध क्षेत्र से दूर रखने को कई लोग तर्क रूप बताते हैं, इनमें ज्यादातर वैसे लोग होते है, जो महिलाओं को आज भी घर की चारदीवारी में रखना चाहते हैं। महिलाओं की शादी को भी सेना की नौकरी के लिए एक रूकावट माना जाता है। लेकिन वैसे तो किसी भी नौकरी में शादी को रूकावट के रूप में ही देखा जाता है।
प्राचीन काल से ही सेना पर पुरुषों का प्रभाव रहा है। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने अपनी रियासत के लिए अंग्रेजों के खिलाफ तलवार उठा ली थी। हाल ही में भारतीय सेना में भी महिलाओं को सबसे संवेदनशील भारत-पाकिस्तान की सीमा पर तैनात किया गया है। इसे भारतीय सेना में एक अभूतपूर्व कदम माना जा रहा है। यह साबित करता है कि धीरे धीरे ही सही अब सेना में भी उनकी भागीदारी को अहम माना जा रहा है। अगर यह दौर इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं होगा जब भारतीय सेनाओं में महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगी।


Sunday, 11 November 2007

घरेलु हिंसा की मौन सहमति......




वह बेचारी दिन भर काम करती है....पति और बच्चों की देखभाल करती है....थकी और बीमार होने पर भी काम करती है....चुपचाप बिना शिक़ायत किये काम करती है....पिटती है फिर भी काम करती है....


मैंने ये चंद शब्द भारतीय नारियों के बारे में लिखने की एक कोशिश की है....हाल में ही परिवार सर्वेक्षण में ५४ फीसदी महिलों ने घरेलु हिंसा को जायज़ ठहराया....अब भला जिस पर आत्याचार हो रह हो और वही उसे सही ठहराए तो......शायद यही कारण है कि उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में कानून बनने के १ साल के बाद १ भी घरेलु हिंसा का मामला दर्ज नहीं किया गया...


जब राष्ट्रपति पद पर श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल आसीन हुई थीं, तब मैं १ लड़की से पूछा था कि १ महिला का देश के सर्वोच्च पद प्राप्त करने के बाद क्या महिलाओं की स्थिति सुधरेगी तो उसने कहा था कि हाँ, १ महिला ही १ महिला के दुख दर्द को समझ सकती है....


मुझे पता नहीं की क्यों महिलाएं अपनी स्थिति को सुधारना नहीं चाहतीं....वो क्यों सदियों से आज तक शोषित और प्रतारित होती रहीं हैं....अपने पति को भगवान् का दर्जा देने वही महिलाएं अपने धरती के भगवान् के खिलाफ चू शब्द भी क्यों नहीं निकलतीं....आज महिलाएं हर क्षेत्र में पुरषों से कन्धा मिल कर चल रहीं हैं....बात चाहे UPA अध्यक्ष सोनिया गाँधी की हो या उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की....ये भी महिलाएं है....और आज इनके पद की वजह से न जाने कितने पुरुष इनसे खौफ खाते हैं....पुरुषवादी समाज में जब तक महिलाएं विद्रोह नहीं करेंगी तब तक वह अपने भाग्य को कोसती रहेंगी....फिर घरेलु हिंसा जैसा कोई कानून उनके किसी काम नही रहेगा....