Showing posts with label टेलीविजन. Show all posts
Showing posts with label टेलीविजन. Show all posts

Tuesday, 24 November 2009

हम किसी से कम नहीं....

महिलाएं आज भले ही हर क्षेत्र में उंची तनख्वाह और उंचे ओहदे पर काम कर रही हैं। लेकिन अभी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां महिलाओं को ये कह कर मना किया जाता है कि उनके प्रजनन से संसाधन का अपव्यय होगा। जी हां हम आज बात कर रहे हैं, सुखोइ विमान उड़ाने पर वायु सेना के उपाध्यक्ष एयर पी. के. बारबोरा के बयान पर। उन्होंने कहा कि महिलाओं के परिवार बढ़ाने की क्षमता के कारण फाइटर पायलट के प्रि’ाक्षण पर किए जाने वाले समय और खचZ का अपव्यय होगा। आज राष्ट्रपति प्रतिभी देवी सिंह पाटिल ने भी सुखोई में उड़ान भर कर ये साबित करने की कोशिश की है की महिलाये किसी से कम नही हैं..
महिलाओं को बराबर का हक दिलाने की बात करने से कुछ नहीं होगा। महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी सेवा को जिम्मेदारी के साथ निभा रही हैं। वायुसेना में भी महिलाएं काम कर रही हैं लेकिन सिफZ प्रजनन के कारण अगर उसे फाइटर पायलट के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, अगर किसी लड़की में एक फाइटर पायलट बनने के सभी गुण मौजूद हैं तो उसे रूका नहीं जाना चाहिए।
माना कि एक फाइटर पायलट के प्रि’ाक्षण पर लगभग 11 करोड़ रुपये का खचZ आता है। ये आधार बिल्कुल ठीक नहीं है कि बच्चे को जन्म देने के लिए महिलाएं एक साल तक सुखोइZ नहीं उड़ा पाती जिससे समय का अपव्यय होता है। अगर ऐसा है तो महिलाओं को कोइZ काम नहीं करना चाहिए। अंतरिक्ष यात्री, पुलिस सेवा और सेना, ये कुछ ऐसी सेवाएं हैं जहां महिलाओं को काफी ‘ाारीरिक श्रम करना पड़ता है। लेकिन वे अपनी भूमिका का बेहतर तरीके से निभा रही हैं।
भारत में अभी तक सेना में महिलाओं की संख्या और दे’ाों की तुलना में काफी कम है।

महिलाएं हर क्षेत्र में सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं, लेकिन सेना जैसे क्षेत्र में उनकी उपस्थिति बहुत कम है। अभी तक सेना में महिलाओं को केवल प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया गया है। उन्हें युद्ध से अलग रखा गया है। हाल ही में सीमा सुरक्षा बल ने महिला बटालियन को भारत-पाकिस्तान की सीमा पर तैनात किया, तो इस बहस ने जोर पकड़ लिया कि क्या महिलाओं को युद्ध क्षेत्र जाने दिया जाना चाहिए?
महिलाओं की युद्ध क्षेत्र से दूरी को उचित बताने वाले लोगों का तर्क है कि प्रकृति के अनुसार महिलाएं युद्ध के लिए पूरी तरह सक्षम नहीं हैं। उनमें पुरुषों जैसी शारीरिक शक्ति का अभाव है। सबसे पहले महिलाओं को डॉक्टर के पदों पर 1943 और नर्सों के रूप में 1927 में शामिल किया गया। 1992 के बाद शोर्ट सर्विस कमीशन के माध्यम से उन्हें युद्ध से अलग अधिकारी पदों पर नियुक्ति दी गई । इसके बाद महिलाओं के लिए सेना के शिक्षा, कानून, सिगनल, इंजीनियरिंग, तकनीकी और खुफिया विभागों का दरवाजा खुला। भारतीय सेना में अभी 2.44 प्रतिशत, नेवी में 3 प्रतिशत और वायुसेना में 6.7 प्रतिशत महिलाएं कार्यरत हैं। वर्तमान में इंडियन नेवी में 258 महिला अधिकारी हैं। ओम्र्ड फ़ोर्स मेडिकल सर्विस में 752 महिला चिकित्सा अधिकारी हैं। जिसमें 86 महिला दंत चिकित्सा और 2,834 महिला नर्सिंग सेवा में कार्यरत हैं।
अगर विदेशों की बात की जाए तो वहां की सेनाओं में महिलाओं की संख्या काफी अधिक है। अमेरिका में लगभग 2 लाख महिलाएं अमेरिकी सेना में हैं, जो अमेरिकी सेना का 20 प्रतिशत के बराबर है। इनमें से कई महिलाएं इराक में तैनात हैं। इस्राइली सेना में भी महिलाओं की संख्या कम नहीं है। लेकिन उन्हें युद्ध क्षेत्र में नहीं भेजा जाता। बि्रटेन में महिलाओं को 1990 में शामिल किया गया। यहां की सेना की तीनों कमानों में लगभग 2 लाख महिलाएं कार्यरत हैं। कनाडा की सेना में महिलाओं की संख्या 13 प्रतिशत है। इसमें सेना के द्वारा लिए जाने वाले फैसलें में भी महिलाएं अपनी भूमिका निभाती हैं। रूस और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी महिलाओं को युद्ध भूमि से दूर रखा गया है। कई इस्लामिक देशों में भी महिलाओं का सेना में प्रवेश वर्जित किया गया है।

इसके पीछे कई कारण गिनाए जाते हैं। महिलाओं को सेना में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जिसमे मनोवैज्ञानिक और शारीरिक कारण प्रमुख हैं। हालांकि विषम परिस्थितियों में अपने परिवार से दूर रहने वाले पुरूश भी कई बार इन समस्याओं से दो-चार होते हैं लेकिन उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। हर बार औरतों को यह एहसास कराया जाता है कि वह स्त्री है इसीलिए वह कोई काम नहीं कर सकती। यही वजह है कि आज महिलाओ ने अपनी काबलियत और अपनी बुद्धमिता साबित कर दी है। जहां तक शारीरिक ताकत की बात है तो बंदूक से गोली चलाने के लिए शारीरिक ताकत से ज्यादा दिल और दिमाग से मजबूत होना ज्यादा जरूरी है। महिलाओं को युद्ध क्षेत्र से दूर रखने को कई लोग तर्क रूप बताते हैं, इनमें ज्यादातर वैसे लोग होते है, जो महिलाओं को आज भी घर की चारदीवारी में रखना चाहते हैं। महिलाओं की शादी को भी सेना की नौकरी के लिए एक रूकावट माना जाता है। लेकिन वैसे तो किसी भी नौकरी में शादी को रूकावट के रूप में ही देखा जाता है।
प्राचीन काल से ही सेना पर पुरुषों का प्रभाव रहा है। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने अपनी रियासत के लिए अंग्रेजों के खिलाफ तलवार उठा ली थी। हाल ही में भारतीय सेना में भी महिलाओं को सबसे संवेदनशील भारत-पाकिस्तान की सीमा पर तैनात किया गया है। इसे भारतीय सेना में एक अभूतपूर्व कदम माना जा रहा है। यह साबित करता है कि धीरे धीरे ही सही अब सेना में भी उनकी भागीदारी को अहम माना जा रहा है। अगर यह दौर इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं होगा जब भारतीय सेनाओं में महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगी।


हिट होने का पैमाना है अशलील गीत


हिन्दी गानों की बात की जाये तो सबसे अधिक लोग सदाबहार गीतों को ही पसंद करते हैं। कितने गाने आये और चले गये लेकिन सदाबहार गीतों का नशा आज भी पूरे ‘शबाब पर है। संगीतप्रेमी आज भी मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर जैसे गायकों के गीत पूरे चाव के साथ सुनते हैं। लेकिन कुछ साल पहले आई कई फिल्मों में हिन्दी गानों को हिट बनाने के लिए उनमें कुछ ऐसे ‘शब्द डाले गये जिसने उस गाने पर अशलीलता ठप्पा लगा दिया। सन् 1993 में आई फिल्म ‘खलनायक’ का ‘चोली के पीछे क्या है, चुनरी के नीचे क्या है’ वाला गीत, जिसे गुनगुनाने में भी आज ‘शर्म आ जाती है। उस वक्त सभी के जुबान पर छा गई थी। इसके बाद आई फिल्म ‘दलाल’ का गीत ‘चढ़ गया उपर रे, अटरिया पे लोटन कबूतर रे’ काफी म’शहूर हुआ, लेकिन इसकी वजह कुछ और थी। इस गीत में गीतकार ने दोहरे अर्थ वाले संवाद लिखे थे। इसका ही असर था कि उस दौर में बहुत जल्दी ही तमाम पान दुकानों और बसों में ये गीत सुनने को मिलने लगे। फिल्म ‘करन अर्जुन ’ का गीत ‘लांबा लांबा घूंघट काहे को कर डाला, क्या कर आई कहीं मुंह काला रे’ को सुनने वालों की कई सालों तक नहीं थी। फिल्म सबसे बड़ा खिलाड़ी के गीत ‘मांग मेरी भरो, चलो प्यार मुझे करो, अंग से अंग मिला के, प्रेम सुधा बरसा के, दासी तेरी प्यासी रही कितने जनम’ की मादकता सुनकर ही महसुस की जा सकती है। कुछ सालों पहले आई फिल्म ‘मर्डर ’ के गीत ‘भींगे होंठ तेरे, प्यासा मन मेरा, लगे अब्र सा ये तन तेरा, कभी कोई रात मेरे साथ गुजार, सुबह तक करूं प्यार’, को आज भी लोग सुनना पसंद करते हैं। हिन्दी फिल्मों में होली हो, उसमें द्विअर्थी संवाद न हो तो कहना ही क्या। होली के गीत तो पहले से ही अशलीलता की चाशनी में डुबो कर पेश किया जाता रहा है। फिल्म ‘डर’ का गीत ‘अंग से अंग लगाना, सजन हमे ऐसे रंग लगाना’ और फिल्म ‘सौतन’ का ‘मेरी पहले ही तंग थी चोली, उपर आ गई बैरन होली, जुल्म तूने कर डाला, प्यार में रंग डाला’ जैसी गीतों ने होली की मादकता को तो महसुस करा दिया लेकिन उसे हिट बनाने में कहीं न कहीं अशलीलता ने अपना कमाल दिखा ही दिया। फिल्म ‘खुद्दार’ का ‘सेक्सी सेक्सी मुझे लोग बोले, हाय सेक्सी हैलो सेक्सी क्यों बोले’, के बोल को बाद में बदल कर ‘बेबी बेबी मुझे लोग बोले, हाय बेबी हैलो बेबी क्यों बोले’ करना पड़ा। सनम बेवफा फिल्म का गीत ‘अंगूर का दाना हूं, सुई न सुभो देना’ जैसी गीतों ने अशलीलता की हद पार कर दी। फिल्म ‘राजा बाबू’ का गीत ‘सरकाये लेयो खटिया के जाड़ा, जाड़े में बलमा प्यारा लागे’ हो या फिल्म ‘लम्हे’ का गीत ‘मोरनी बागामा बोले आधी रात मा’। इन सभी गीतों में एक ही बात समान है कि इनके बोल अशलील हैं। गीतों के बोल को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की कला को ही सफलता की सीढ़ी मान ली गयी है। हिन्दी शब्दों का सही प्रयोग कर अश लीलता से बचा जा सकता है। लेकिन गीतकार दर्शक वर्ग पर इतने मेहरबान हो जाते हैं कि वे कुछ ऐसे शब्दों का उपयोग कर देते हैं, जिससे गाना अशलील बनने से बच नहीं पाता है। हिन्दी फिल्मों के गीतों के बोल और उसे फिल्माने का तरीका इतना अशलील होता है कि पूरा गीत ही अशलील बन जाता है। फिल्मों में अशलीलता को पेश करने के कई तर्क दिए जाते हैं, लेकिन गीत और संगीत को मशहूर बनाने के लिए किसी भी कीमत पर उससे खिलवाड़ करने का हक किसी को नहीं है।

Monday, 16 November 2009

टी वी पर देख तमाशा देख

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (पीएमसीएच) और दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (डीएमसीएच) को बिहार के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में माना जाता है. यहाँ वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर के जूनियर डॉक्टर पिछले ७ दिनों से हड़ताल पर हैं. इस दौरान लगभग ७१ मरीजों कि जान चली गयी. राज्य मानवधिकार आयोग के ह़डताली जूनियर डॉक्टरों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने का निर्देश दिया है। ये खबर कोई न्यूज़ चैनल नहीं दिखा रहा है. क्यों ? क्या ये खबर नहीं है? आप भी न्यूज़ चैनल ज़रूर देखते होंगे. कितनी बार आपने ये खबर देखि या सुनी है?
मैं बहुत कम समय के लिए सभी न्यूज़ चैनलों को दिन में २-३ बार देख ही लेता हूँ. सचिन तेंदुलकर के २० साल पूरे करने पर सभी न्यूज़ चैनलों और न्यूज़ पेपरों ने ३ दिन तक इस न्यूज़ को खीचा. बिग बॉस के घर में क्या चल रहा है इस न्यूज़ बना कर दिन के कई घंटे दर्शकों को मुर्ख बनाया जा रहा है. हद हो गयी ही न्यूज़ चैनल किसी भी लिहाज से न्यूज़ चैनल नहीं लगता. एक प्रोग्राम है सास बहु और साजिश, दोपहर के ३ बजे आने वाले इस प्रोग्राम से मिलतेजुलते प्रोग्राम को ३ न्यूज़ चैनल एक ही समय पर दिखाते हैं...न्यूज़ चैनल परचून के दूकान के सामान लगता है. एक ही खबर को इतना खीचा जाता है कि उससे दर्शको में उब सी होने लगती है.
मैंने एक दो लोगो से जानना चाहा कि वो कौन सा न्यूज़ चैनल पसंद करते हैं और क्यों? उनका जवाब चौकाने वाला था. उन्होंने एक विशेषज्ञ कि तरह न्यूज़ चैनलों कि बखिया उधेर दी. मुझे बहुत अच्छा लगा कि दर्शक ही बहुत जानकर होते हैं. उन्हें भी पता है कि कौन सी खबर महत्वपूर्ण है और कौन सी बकवास...
बहुत दुःख होता है ये सोच कर कि लोग मज़बूरी में उन खबरों को देखते हैं जिसे वो देखना नहीं चाहतें. मीडिया से जनसरोकार ख़त्म होता जा रहा है. और उसकी जगह व्यापार बनता जा रहा है. टी आर पी की अंधी दौर में कुछ चैनल जनसरोकार की खबरें दिखाते है तो उन्हें इसके घाटा ही उठाना पड़ता है और जो चैनल अजब गजब खबरे दिखाते है. वो नंबर १ बन जाते हैं. वाह रे टी वी की दुनिया...

Monday, 27 April 2009

अश्लीलता पेंटिग्स में नहीं आपकी आँखों में है....

मशहूर चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन के कुछ चित्रों को लेकर पिछले एक-डेढ़ दशक से एक अभियान सा चलाया जा रहा है। ज़ाहिर है इस अभियान के पीछे वे हिंदुत्ववादी शक्तियाँ हैं जिनके दिल और दिमाग़ों में धर्मोन्माद का ज़हर भरा है और जो नफ़रत की राजनीति करती हैं। इस अभियान के तहत हुसैन की कुछ पेंटिग्स को आधार बनाकर ये प्रचार किया जा रहा है कि उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं के निर्वस्त्र/ अर्ध निर्वस्त्र चित्र बनाकर हिंदुओं का अपमान किया है। इस सिलसिले में देश के कई स्थानों में उनके ख़िलाफ़ मुकद्दमें भी दायर किए गए, जिन्हें बाद में अदालत ने खारिज़ कर दिया। लेकिन कट्टरपंथियों ने अपना काम जारी रखा है और वे इंटरनेट का इस्तेमाल करके ऐसे कथित चित्र लोगों को भेज रहे हैं। करीब साल भर पहले ऐसे कुछ चित्र मेरे पास भी भेजे गए थे। इनमें एक लक्ष्मी, एक सरस्वती, एक दुर्गा, एक पार्वती, एक भारतमाता का है, जो या तो नर्वस्त्र हैं या अर्धनिर्वस्त्र। इन्हें मैंने बिना देखे ही कूड़े के हवाले कर दिया था, क्योंकि मुझे पता था कि उनके पीछे भेजने वाले की मंशा क्या है। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर इससे विचलित हो गए और बगैर छानबीन में जुट गए। उन्होंने ये चित्र हुसैन पर पूरी किताब लिखने वाले जानकार के। बिक्रम सिंह को भेजकर पूछताछ की। बिक्रम सिंह ने अपने नियमित स्तंभ बिंब-प्रतिबिंब (जनसत्ता) के ज़रिए जवाब दिया मगर राजकिशोर इससे संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने एक जवाबी लेख लिख डाला। बिक्रम सिंह ने अब फिर से इस जवाबी लेख का जवाब दिया है। पेश है उसका सार-संक्षेप-1- मेरे लेख के बारे में राजकिशोरजी ने कहा है कि मेरे लेख से पता चलता है कि मेरी भावना मेरी बुद्धि र हावी हो गई है। उनका सवाल ये है कि हुसैन ने ऐसे चित्र हिंदू देवी-देवताओं का अनादर करने के लिए बनाए। साथ ही ये भी कि क्या इनसे हिंदुओं की भावनाओं को चोट नहीं पहुँचती। पहली बात ये है कि कला के मामले में भावनाओं को कला से अलग नहीं किया जा सकता। मैंने पिछले लेख में कहा था कि हिंदू कला में देवी-देवताओं को निर्वस्त्र दिखाने की एक लंबी परंपरा हैय़ यहाँ यह साफ कर दूं कि हिंदू संस्कृति में हम स्त्रियों की नग्नता से परेशान होते हैं। पुरुष तो कपड़े उतारकर नागा साधुओं की तरह कहूं भी जा सकता है। इसलिए जब हुसैन कुछ हिंदू देवियों या पूज्यजनों को निर्वस्त्र या अर्धनग्न दिखाते हैं तो वे एक परंपरा का अनुगमन कर रहे हैं। इसके विपरीत इस्लाम में ऐसी कोई परंपरा नहीं और इसलिए इस्लाम के पूज्यजनों को नग्न दिखाना किसी को भी ठीक नहीं लगता। जैन धर्म में तीर्थंकरों को और स्वयं महावीर को लिंग समेत दिखाने की परंपरा है। इसे कोई अश्लील या आपत्तिजनक नहीं मानता। उन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं अश्लील तब बनेंगी अगर उन्हें कृष्ण या गाँधी की तरह धोती पहना दी जाएं। इसलिए नग्नता पवित्रता हो सकती है, जैसा कि हुसैन ने देवी-देवाताओं की निर्वस्त्रता के संदर्भ में कहा है। इसका यह मतलब नहीं कि निर्वस्त्रता या नग्नता का प्रयोग किसी व्यक्ति का उपहास करने के लिए या उसे नीचा दिखाने के लिए नहीं किया जा सकता। हुसेन के एक चित्र में इसीलिए हिटलर को नग्न दिखाया गया है। समझ में नहीं आता कि राजकिशोर जी को इन दोनों बातों में कौन सा अंतर्विरोध नज़र आता है, जिसको लेकर वे इतने परेशान हैं।2- एक चित्र हिटलर वाला है जिसमें गाँधी के सर की जगह चक्र लगा है। अगर आपका विवेक आपकी भावनाओं को ऐसा प्रशिक्षण देने में सफल रहा है कि आप एक भारतीय मुसलमान कलाकार की कृति को शक की नज़र से न देखें तो साफ है कि यह चक्र नैतिक आलोक का प्रतीक है। लेकिन इस चित्र के नीचे ई-मेल भेजने वाले खुराफ़ाती हुजूर लिखते हैं कि इस तस्वीर में गाँधीजी का सिर कलम कर दिया गया है। यह जानबूझकर हिंदुओं की भावनाओं को उकसाने की कोशिश नहीं तो क्या है। 3- राजकिशोरजी कहते हैं कि चौदह चित्रों से यह बहुत सफाई से लक्षित होता है कि सभी हिंदू चरित्रों को नग्न दिखाया गया है। राजकिशोरजी के इस कथन से एक बात और लक्षित होती है कि ई-मेल वाले शैतान का तीर ठीक निशाने पर बैठा है। जानबूझकर केवल निर्वस्त्र या अर्ध निर्वस्त्र अवस्था में देवियों के चित्र इकट्ठा करके वह लोगों को यह समझाने में सफल हो गया है कि हुसेन ने हमेशा हिंदू-देवी देवताओं का नग्न चित्रण किया है। राजकिशोर जी से आग्रह है कि ने मेरी पुस्तक का एक अध्याय “आई एम ए बिलीवर” (मैं आस्तिक हूँ) देख लें। उन्हें इसमें ऐसे कई चित्र मिल जाएंगे, खास तौर से कृष्ण के साथ राधा के जिनमें कोई नग्नता नहीं है। ये सही है कि हुसेन पाँच दफ़ा नमाज पढ़ने वाले मुसलमान हैं, लेकिन वे सब धर्मों की इज्ज़त करते हैं और इसीलिए उन्होंने संसार के सभी बड़े धर्मों को लेकर चित्र बनाए हैं। अगर इन बातों से राजकिशोर जी को उनकी सहिष्णुता का प्रमाण नहीं मिलता तो हुसेन को क्या करना चाहिए?4- राजकिशोरजी का सुझाव है कि हुसेन अपने विवादास्पद चित्रों को विनम्रतापूर्वक वापस ले लें, जिनसे सांप्रदायिकता को ताक़त मिल रही है। उनका ये सुझाव बेहद ख़तरनाक है, क्योंकि यह रास्ता सीधा बाबरी मस्जिद के विध्वंस की तरफ जाता है। तर्क सीधा है-क्योंकि हिंदू कट्टरवादियों को बाबरी मस्जिद बर्दाश्त नहीं थी, इसलिए उसे हटा देना ज़रूरी था। आज की स्थिति में इन चित्रों को वापस लेने से सांप्रदायिक शक्तियों को और बल मिलेगा। न जाने कितनी किताबों को जलाना पड़ेगा, कितनी फिल्मों पर प्रतिबंध लगेगा। “परजानिया” जैसी फिल्म जो गुजरात में दिखाई नहीं जा सकी, भारत के किसी हिस्से में दिखाई नहीं जा सकेगी। ज़रूरी है कि हम पहचानें कि जो लोग ऐसे विवाद उठाते हैं उनकी असली मंशा क्या है और उसकी मुखाल्फत करें, न कि उसके सामने झुकें। ई-मेल में दिखाए गए चित्र(कम से कम जिन्हें मैं जानता हूँ) बीस-तीस साल पुराने हैं। उस समय तो इन चित्रों को लेकर विवाद खड़ा नहीं हुआ था। आज ये विवाद क्यों खड़ा किया जा रहा है।5-अंत में वह सवाल जिसे राजकिशोरजी ने बार-बार उठाया है, ये चित्र हुसेन के हैं या नहीं। हुसेन पर पुस्तक लिखने के दौरान मैंने उनके करीब 2000 चित्र देखे होंगे। इस प्रक्रिया में मैंने पंद्रह में से सात चित्र अवश्य देखे थे, इसलिए मैं कह सकता हूँ कि ये चित्र हुसेन के ही हैं। बाकी के चित्रों के बारे में केवल इंटरनेट पर देख कर यह कहना कि ये चित्र हुसेन के हैं या नहीं, किसी भी ज़िम्मेदार व्यक्ति के लिए ग़लत होगा। एक पेंटिंग की प्रामाणिकता स्थापित करने के लिए साधारणतया मूल पेंटिंग देखना आवश्यक होता है।
(साभार : देशकाल)

Monday, 23 February 2009

स्लम की जय हो......

ऑस्कर में भी एक आम आदमी की कहानी ने बाजी मार ली....लोगो को शर्म आ रही है की भारत को ऑस्कर मिला भी तो उसके गरीबों की कहानी पर...भारत में २७ फिसिदी लोग गरीबी रेखा के निचे रहते हैं...इसके अलावा करोडो लोग आज भी सड़क किनारे ज़िन्दगी काट रहे हैं....क्या हम उन्हें नही देखते जो पुलों के निचे सड़क किनारे और फुटपाथ पर ज़िन्दगी बिता रहे है....१००० अरबपतियों वाले इस देश में रोजाना लोग भूख से मर जाते है....माना की भारत तेज़ी से विकास कर रहा है लेकिन इसे भी नही झुठलाया जा सकता की इस विकास की तेज़ रफ़्तार में करोडो लोग पीछे छुट रहे है....सरकार ने उन्हें भी विकास के साथ जोड़ने से लिए तमाम तरह की योजनायों की शुरुआत की है लेकिन इन योजनाओ का फायदा किसे मिल रहा है ये किसी से छुपा नही है.....स्लम डोग हो या स्लम बॉय......बात इतनी है की न स्लम ख़तम होगा न वहां रहने वाले कम होंगे....ऑस्कर अवार्ड केवल हमारी गरीबी और भूखमरी से लिए नही मिला है.....उसमे A R Rahman के संगीत के जादू को भी ऑस्कर दिया गया है....इस फ़िल्म में काम करने वाले कलाकारों के योगदान को नाकारा नही जा सकता.....बहरहाल आप जितनी भी आलोचना करें.....ऑस्कर तो हमने पा ही लिया है......जय हो.....

Friday, 8 August 2008

डर को बेचने वाले


शनि, एलियंस, साईं और न जाने क्या क्या.......कुछ चैनलों ने लोगों के सही नब्ज को पकड़ लिया है. वे जानते हैं की पब्लिक को क्या चाहिए. ये पब्लिक केवल डर वाली चीजे पसंद करती है...डरो और बेचो. डरकर देखेंगे....लेकिन देखेंगे तो. पब्लिक बोरिंग चीजे देख देख कर थक चुकी है. अब इन्हे चाहिए कुछ रियल और रियल लाइफ में तो कदम कदम पर डर है. हर कोई डरा हुआ है....तो भइया अब चैनलों ने कसम खा लिया है की ये पब्लिक को डरा के कमाएंगे...लेकिन इतिहास गवाह है की कोई भी फार्मूला ज़्यादा दिनों तक नही चलता..जो अभी बिक रहा है वो ज़रूरी नही है की एक महीने बाद भी बिक ही जाए......लेकिन इस फोर्मुले को भी फ़ैल कर दिया है सबके चहेते इंडिया टीवी ने.....जब से ये चैनल आया है तब से टीवी न्यूज़ में नयी करांति आ गयी है.... दर्शकों ने ज़्यादा टीवी देखनी शुरू कर दी है...उन्हें साईं के करिश्मे खूब भा रहे हैं. उन्हें शनि देव पसंद आ रहे हैं...उन्हें सितारों की दुनिया पसंद है..ये चैनल न्यूज़ चैनल होने की ज़िम्मेदारी निभाने की खातिर एकाद बार हेड लाइंस बता देता है और इसके बाद अपने काम पर लग जाता है...मैंने कई लोगों को कहते सुना है की ये चैनल लोगों को मुर्ख बनता है....लेकिन भइया ये तो बताइए की टी आर पी में नम्बर १ कैसे है?