Monday 15 September 2008

कौन है जिम्मेदार?




ये इत्तेफाक था की मैं शनिवार की शाम ऑफिस से शीधे घर पंहुचा......ठीक ६.५० में मेरे एक मित्र का फ़ोन आया की तुम कहाँ हो? तब मुझे पता चला की दिल्ली में ५ धमाके हुए हैं... मैं भी अपने मित्रबंधु से उनकी जानकारी ली...इस धमाके में २५ लोगों की जान चली गयी...वो मेरे कोई नही थे...वे आम लोग थे...एक बार फिर आतंकियों ने आम आदमी को अपना निशाना बनाया। हर बार आम आदमी यानि वो common man अपनी जान गंवाता है जिसने किसी का कुछ नहीं बिगाडा है. नीरज पाण्डेय की फ़िल्म A Wednesday इसी मुद्दे पर बनी एक बेहतरीन फ़िल्म है...ये फ़िल्म नही आम लोगों की आवाज़ है...एक आम आदमी system से इतना तंग आ जाता है वो आतंक्वादिवों की हत्या का फ़ैसला कर लेता है. और वो भी इस अंदाज़ में की सारा पुलिस महकमा उसके सामने बेबस हो जाता है. नासिर्रुद्दीन शाह और अनुपम खेर का अभिनय ने फ़िल्म में जान डाल दी है. फ़िल्म ने सारे प्रशासन को एक पाठ पढाया है की आतंकवाद को ख़तम करने के लिए इक्षाशक्ति की ज़रूरत है. जब दिल्ली में बम फटा तो सारा पुलिस डिपार्टमेन्ट सो रहा था..इनकी नींद तब खुली जब धमाके की आवाज़ इनके कानो तक पहुची. पुलिस और सारे लोगो को ये चुनौती है की आख़िर किस कमी के कारण आतंकवादी बीच बाज़ार में विस्फोट करने में कामयाब हो गए. इतने बेगुनाहों की जान गयी उसका जिम्मेदार कौन है?

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